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Rigveda Mandal 5 / Sukta 36 / Mantra 5

87 Sukta
6 Mantra
5/36/5
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रभूवसुराङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वृषा॑ त्वा॒ वृष॑णं वर्धतु॒ द्यौर्वृषा॒ वृष॑भ्यां वहसे॒ हरि॑भ्याम्। स नो॒ वृषा॒ वृष॑रथः सुशिप्र॒ वृष॑क्रतो॒ वृषा॑ वज्रि॒न्भरे॑ धाः ॥५॥

वृषा॑ । त्वा॒ । वृष॑णम् । व॒र्ध॒तु॒ । द्यौः । वृषा॑ । वृष॑ऽभ्याम् । व॒ह॒से॒ । हरि॑ऽभ्याम् । सः । नः॒ । वृषा॑ । वृष॑ऽरथः । सु॒ऽशि॒प्र॒ । वृष॑क्रतो॒ इति॒ वृष॑ऽक्रतो । वृषा॑ । वज्रि॒न् । भरे॑ । धाः॒ ॥

Mantra without Swara
वृषा त्वा वृषणं वर्धतु द्यौर्वृषा वृषभ्यां वहसे हरिभ्याम्। स नो वृषा वृषरथः सुशिप्र वृषक्रतो वृषा वज्रिन्भरे धाः ॥

वृषा। त्वा। वृषणम्। वर्धतु। द्यौः। वृषा। वृषऽभ्याम्। वहसे। हरिऽभ्याम्। सः। नः। वृषा। वृषऽरथः। सुऽशिप्र। वृषक्रतो इति वृषऽक्रतो। वृषा। वज्रिन्। भरे। धाः ॥५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सुशिप्र) उत्तम कमल के समान मुखवाले (वृषक्रतो) बलवानों की बुद्धि और कर्म्मों के सदृश बुद्धि और कर्म्म जिसके वह (वज्रिन्) शस्त्र और अस्त्र के ज्ञान से युक्त राजन् ! जो (वृषा) सुख वर्षानेवाला (वृषणम्) बलिष्ठ (त्वा) आप को (वर्धतु) बढ़ावे और जो (वृषा) वृष के समान बलवान् आप (द्यौः) सत्य कामनावाले के सदृश (वृषभ्याम्) बल से युक्त (हरिभ्याम्) हरणशील हस्तों से (वहसे) प्राप्त होते वा प्राप्त कराते हो (सः) वह (वृषा) दुष्टों की शक्ति रोकनेवाला और आप (वृषरथः) बलिष्ठ बैल रथ में जिनके ऐसे (वृषा) विद्या के वर्षानेवाले (नः) हम लोगों को (भरे) संग्राम में (धाः) धरिये धारण कीजिये ॥५॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो विद्वान् तुम लोगों को सर्वदा बढ़ाते हैं, उनको आप संग्राम में विजय के लिये प्रेरणा दीजिये ॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥