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Rigveda Mandal 5 / Sukta 36 / Mantra 4

87 Sukta
6 Mantra
5/36/4
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रभूवसुराङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒ष ग्रावे॑व जरि॒ता त॑ इ॒न्द्रेय॑र्ति॒ वाचं॑ बृ॒हदा॑शुषा॒णः। प्र स॒व्येन॑ मघव॒न्यंसि॑ रा॒यः प्र द॑क्षि॒णिद्ध॑रिवो॒ मा वि वे॑नः ॥४॥

ए॒षः । ग्रावा॑ऽइव । ज॒रि॒ता । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । इय॑र्ति । वाच॑म् । बृ॒हत् । आ॒शु॒षा॒णः । प्र । से॒व्येन॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । यंसि॑ । रा॒यः । प्र । द॒क्षि॒णित् । ह॒रि॒ऽवः॒ । मा । वि । वे॒नः॒ ॥

Mantra without Swara
एष ग्रावेव जरिता त इन्द्रेयर्ति वाचं बृहदाशुषाणः। प्र सव्येन मघवन्यंसि रायः प्र दक्षिणिद्धरिवो मा वि वेनः ॥

एषः। ग्रावाऽइव। जरिता। ते। इन्द्र। इयर्ति। वाचम्। बृहत्। आशुषाणः। प्र। सव्येन। मघऽवन्। यंसि। रायः। प्र। दक्षिणित्। हरिऽवः। मा। वि। वेनः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (हरिवः) उत्तम मन्त्रियों से और (मघवन्) धन से युक्त (इन्द्र) शत्रुओं के नाश करनेवाले राजन् ! जो (ते) आपका (एषः) यह (जरिता) सम्पूर्ण विद्याओं की प्रशंसा करनेवाला (ग्रावेव) मेघ के सदृश (वाचम्) उत्तम शिक्षायुक्त वाणी को (इयर्त्ति) प्राप्त होता है, वह (बृहत्) बड़े को (आशुषाणः) व्याप्त होता हुआ (सव्येन) वाम ओर से (प्र, दक्षिणित्) उत्तम प्रकार दहिने भाग से चलनेवाला (रायः) धन के (प्र, यंसि) उत्तम प्रकार प्राप्त होने वा नियम करनेवाले हो वह आप (वि) विशेष करके (वेनः) कामना करनेवाले (मा) न हूजिये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो बड़े विद्वान् जन वाणी को ग्रहण कर वा ग्रहण कराय के इन्द्रियों के निग्रह करनेवाले होते हैं, वे निष्फल मनोरथवाले नहीं होते हैं, किन्तु सत्यकाम और असत्य के द्वेषी निरन्तर वर्त्तमान हैं ॥४॥
Subject
अब विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥