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Rigveda Mandal 5 / Sukta 36 / Mantra 3

87 Sukta
6 Mantra
5/36/3
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रभूवसुराङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
च॒क्रं न वृ॒त्तं पु॑रुहूत वेपते॒ मनो॑ भि॒या मे॒ अम॑ते॒रिद॑द्रिवः। रथा॒दधि॑ त्वा जरि॒ता स॑दावृध कु॒विन्नु स्तो॑षन्मघवन्पुरू॒वसुः॑ ॥३॥

च॒क्रम् । न । वृ॒त्तम् । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । वे॒प॒ते॒ । मनः॑ । भि॒या । मे॒ । अम॑तेः । इत् । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । रथा॑त् । अधि॑ । त्वा॒ । ज॒रि॒ता । स॒दा॒ऽवृ॒ध॒ । कु॒वित् । नु । स्तो॒ष॒म् । म॒घ॒ऽव॒न् । पु॒रु॒ऽवसुः॑ ॥

Mantra without Swara
चक्रं न वृत्तं पुरुहूत वेपते मनो भिया मे अमतेरिदद्रिवः। रथादधि त्वा जरिता सदावृध कुविन्नु स्तोषन्मघवन्पुरूवसुः ॥

चक्रम्। न। वृत्तम्। पुरुऽहूत। वेपते। मनः। भिया। मे। अमतेः। इत्। अद्रिऽवः। रथात्। अधि। त्वा। जरिता। सदाऽवृध। कुवित्। नु। स्तोषत्। मघऽवन्। पुरुऽवसुः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 3

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Meaning
हे (अद्रिवः) मेघ और सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान (पुरुहूत) बहुतों में सत्कार पाये हुए (मघवन्) बहुत धनों से युक्त (सदावृध) सदा वृद्धि करनेवाले राजन् ! जिस कारण (अमतेः, मे) मुझ निर्बुद्धि का (इत्) ही (मनः) चित्त (रथात्) वाहन से (वृत्तम्) वर्त्ते हुए (चक्रम्) चक्र के (न) सदृश (भिया) भय से (वेपते) कंपता है, उस कारण का आप निवारण कीजिये और जो (कुवित्) महान् (पुरूवसुः) असंख्यधन से युक्त (जरिता) स्तुति करनेवाला (त्वा) आपकी (नु) निश्चय (अधि, स्तोषत्) स्तुति करे उसका आप सत्कार करें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो राजा चोर और साहस करनेवाले जनों का प्रयत्न से न निवारण करे और श्रेष्ठ जनों का न सत्कार करे तो भय के उद्भव से प्रजायें व्याकुल होवें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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