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Rigveda Mandal 5 / Sukta 36 / Mantra 2

87 Sukta
6 Mantra
5/36/2
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रभूवसुराङ्गिरसः Chhanda- भुरिग्बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
आ ते॒ हनू॑ हरिवः शूर॒ शिप्रे॒ रुह॒त्सोमो॒ न पर्व॑तस्य पृ॒ष्ठे। अनु॑ त्वा राज॒न्नर्व॑तो॒ न हि॒न्वन् गी॒र्भिर्म॑देम पुरुहूत॒ विश्वे॑ ॥२॥

आ । ते॒ । हनू॒ इति॑ । ह॒रि॒ऽवः॒ । शू॒र॒ । शिप्रे॒ इति॑ । रुह॑त् । सोमः॑ । न । पर्व॑तस्य । पृ॒ष्ठे । अनु॑ । त्वा॒ । रा॒ज॒न् । अर्व॑तः । न । हि॒न्वन् । गीः॒ऽभिः । म॒दे॒म॒ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । विश्वे॑ ॥

Mantra without Swara
आ ते हनू हरिवः शूर शिप्रे रुहत्सोमो न पर्वतस्य पृष्ठे। अनु त्वा राजन्नर्वतो न हिन्वन् गीर्भिर्मदेम पुरुहूत विश्वे ॥

आ। ते। हनू इति। हरिऽवः। शूर। शिप्रे इति। रुहत्। सोमः। न। पर्वतस्य। पृष्ठे। अनु। त्वा। राजन्। अर्वतः। न। हिन्वन्। गीःऽभिः। मदेम। पुरुऽहूत। विश्वे ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (हरिवः) अच्छे मनुष्यों से युक्त (शूर) शत्रुओं के नाश करनेवाले (पुरुहूत) बहुतों से सत्कार किये गये (राजन्) राजन् ! जिन (ते) आप को (शिप्रे) उत्तम प्रकार शोभित (हनू) मुख और नासिका (गीर्भिः) सत्य से उज्ज्वल वाणियों से (हिन्वन्) चलवाता हुआ (अर्वतः) घोड़ों के (न) सदृश और (पर्वतस्य) पर्वत के (पृष्ठे) ऊपर (सोमः) सोमलता के (न) सदृश व्यवहार (आ, रुहत्) प्रकट होता है उन (त्वा) आप को (विश्वे) सब हम लोग (अनु, मदेम) आनन्दित करें तथा आप हम लोगों को आनन्दित करिये ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो राजा सत्सङ्ग करता है, वह पर्वत में सोमलता के सदृश सब ओर से वृद्धि को प्राप्त होता है ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥