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Rigveda Mandal 5 / Sukta 36 / Mantra 1

87 Sukta
6 Mantra
5/36/1
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रभूवसुराङ्गिरसः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स आ ग॑म॒दिन्द्रो॒ यो वसू॑नां॒ चिके॑त॒द्दातुं॒ दाम॑नो रयी॒णाम्। ध॒न्व॒च॒रो न वंस॑गस्तृषा॒णश्च॑कमा॒नः पि॑बतु दु॒ग्धमं॒शुम् ॥१॥

सः । आ । ग॒म॒त् । इन्द्रः॑ । यः । वसू॑नाम् । चिके॑तत् । दातु॑म् । दाम॑नः । र॒यी॒णाम् । ध॒न्व॒ऽच॒रः । न । वंस॑ऽगः । तृ॒षा॒णः । च॒क॒मा॒नः । पि॒ब॒तु॒ । दु॒ग्धम् । अं॒शुम् ॥

Mantra without Swara
स आ गमदिन्द्रो यो वसूनां चिकेतद्दातुं दामनो रयीणाम्। धन्वचरो न वंसगस्तृषाणश्चकमानः पिबतु दुग्धमंशुम् ॥

सः। आ। गमत्। इन्द्रः। यः। वसूनाम्। चिकेतत्। दातुम्। दामनः। रयीणाम्। धन्वऽचरः। न। वंसगः। तृषाणः। चकमानः। पिबतु। दुग्धम्। अंशुम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 7 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (इन्द्रः) दाता (वसूनाम्) द्रव्यों के (दातुम्) देने को (चिकेतत्) जानता और (रयीणाम्) धनों की (दामनः) देनेवालियों को जानता है (सः) वह (तृषाणः) पिपासा से व्याकुल के सदृश और (धन्वचरः) अन्तरिक्ष में चलनेवाले के (न) सदृश (वंसगः) सत्य और असत्य के विभाग करनेवालों को प्राप्त होनेवाला और (चकमानः) कामना करता हुआ हम लोगों को (आ) सब प्रकार से (गमत्) प्राप्त होवे और (अंशुम्) प्राणों के देनेवाले (दुग्धम्) दुग्ध का (पिबतु) पान करे ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो धन देने, विचार करने, सत्य की कामना करने और मर्य्यादा को चाहनेवाला होवे, उसी को राजा मानें ॥१॥
Subject
अब छः ऋचावाले छत्तीसवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजविषय को कहते हैं ॥

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