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Rigveda Mandal 5 / Sukta 35 / Mantra 8

87 Sukta
8 Mantra
5/35/8
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रभूवसुराङ्गिरसः Chhanda- स्वराडुष्निक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ॒स्माक॑मि॒न्द्रेहि॑ नो॒ रथ॑मवा॒ पुरं॑ध्या। व॒यं श॑विष्ठ॒ वार्यं॑ दि॒वि श्रवो॑ दधीमहि दि॒वि स्तोमं॑ मनामहे ॥८॥

अ॒स्माक॑म् । इ॒न्द्र॒ । आ । इ॒हि॒ । नः॒ । रथ॑म् । अ॒व॒ । पुर॑म्ऽध्या । व॒यम् । श॒वि॒ष्ठ॒ । वार्य॑म् । दि॒वि । श्रवः॑ । द॒धी॒म॒हि॒ । दि॒वि । स्तोम॑म् । म॒ना॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
अस्माकमिन्द्रेहि नो रथमवा पुरंध्या। वयं शविष्ठ वार्यं दिवि श्रवो दधीमहि दिवि स्तोमं मनामहे ॥

अस्माकम्। इन्द्र। आ। इहि। नः। रथम्। अव। पुरम्ऽध्या। वयम्। शविष्ठ। वार्यम्। दिवि। श्रवः। दधीमहि। दिवि। स्तोमम्। मनामहे ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 6 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शविष्ठ) अत्यन्त बल से युक्त (इन्द्र) राजन् ! आप (पुरन्ध्या) बहुत विद्या को धारण करनेवाली बुद्धि से (अस्माकम्) हम लोगों के (रथम्) बहुत प्रकार के वाहन को (आ, इहि) प्राप्त हूजिये और (नः) हम लोगों का निरन्तर (अवा) पालन कीजिये जिससे (वयम्) हम लोग (दिवि) मनोहर राज्य में (वार्य्यम्) स्वीकार करने योग्य (श्रवः) श्रवण वा अन्न को (दधीमहि) धारण करें और (दिवि) प्रशंसा करने योग्य राज्य में (स्तोमम्) सम्पूर्ण शास्त्र के पढ़ने और पढ़ाने को (मनामहे) जानें ॥८॥
Essence
वही प्रजा का प्रिय होता है, जो राजा न्याय से प्रजाओं का उत्तम प्रकार पालन करके विद्या और उत्तम शिक्षा की प्रजाओं में प्रवृत्ति करे ॥८॥ इस सूक्त में इन्द्र राजा प्रजा और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह पैंतीसवाँ सूक्त और छठा वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
अब राजद्वारा विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥