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Rigveda Mandal 5 / Sukta 35 / Mantra 4

87 Sukta
8 Mantra
5/35/4
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रभूवसुराङ्गिरसः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
वृषा॒ ह्यसि॒ राध॑से जज्ञि॒षे वृष्णि॑ ते॒ शवः॑। स्वक्ष॑त्रं ते धृ॒षन्मनः॑ सत्रा॒हमि॑न्द्र॒ पौंस्य॑म् ॥४॥

वृषा॑ । हि । असि॑ । राध॑से । ज॒ज्ञि॒षे । वृष्णि॑ । ते॒ । शवः॑ । स्वऽक्ष॑त्रम् । ते॒ । धृ॒षम् । मनः॑ । स॒त्रा॒ऽहम् । इ॒न्द्र॒ । पौंस्य॑म् ॥

Mantra without Swara
वृषा ह्यसि राधसे जज्ञिषे वृष्णि ते शवः। स्वक्षत्रं ते धृषन्मनः सत्राहमिन्द्र पौंस्यम् ॥

वृषा। हि। असि। राधसे। जज्ञिषे। वृष्णि। ते। शवः। स्वक्षत्रम्। ते। धृषत्। मनः। सत्राऽहम्। इन्द्र। पौंस्यम् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 5 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) बलवान् पुरुष ! (हि) जिससे आप (वृषा) बलिष्ठ वा सुख के वर्षानेवाले (असि) हैं और (राधसे) धनरूप ऐश्वर्य्य के लिये (जज्ञिषे) प्रकट होते हो, जिन (ते) आपका (वृष्णिः) सुख वर्षानेवाले (शवः) बल और (स्वक्षत्रम्) अपना राज्य वा अपना क्षत्रियकुल जिन (ते) आपका (धृषत्) प्रगल्भ अर्थात् धृष्ट (मनः) चित्त जिन आपका (सत्राहम्) सत्य धर्म्म के आचरण का प्रकट करनेवाला दिन और (पौंस्यम्) पुरुषों के लिये हितकारक बल है, उन आप को हम लोग राजा मानते हैं ॥४॥
Essence
प्रजाओं को चाहिये कि जो बलवान्, पूर्ण विद्या, विनय और बल से युक्त, शूरता आदि गुणों से धृष्ट, सदा न्याय और धर्म्माचरणयुक्त हो, उसी को राजा मानें ॥४॥
Subject
अब प्रजाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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