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Rigveda Mandal 5 / Sukta 35 / Mantra 3

87 Sukta
8 Mantra
5/35/3
Devata- इन्द्र: Rishi- प्रभूवसुराङ्गिरसः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
आ तेऽवो॒ वरे॑ण्यं॒ वृष॑न्तमस्य हूमहे। वृष॑जूति॒र्हि ज॑ज्ञि॒ष आ॒भूभि॑रिन्द्र तु॒र्वणिः॑ ॥३॥

आ । ते॒ । अवः॑ । वरे॑ण्यम् । वृष॑न्ऽतमस्य । हू॒म॒हे॒ । वृष॑ऽजूतिः । हि । ज॒ज्ञि॒षे । आ॒ऽभूभिः॑ । इ॒न्द्र॒ । तु॒र्वणिः॑ ॥

Mantra without Swara
आ तेऽवो वरेण्यं वृषन्तमस्य हूमहे। वृषजूतिर्हि जज्ञिष आभूभिरिन्द्र तुर्वणिः ॥

आ। ते। अवः। वरेण्यम्। वृषन्ऽतमस्य। हूमहे। वृषऽजूतिः। हि। जज्ञिषे। आऽभूभिः। इन्द्र। तुर्वणिः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 5 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त राजन् ! (हि) जिससे (वृषजूतिः) वृष के वेग से युक्त (तुर्वणिः) शीघ्रकारी और श्रेष्ठ गुणों से युक्त मन्त्रियों की याचना करनेवाले आप (आभूभिः) जो विद्या और विनय में सब ओर से प्रकट होते हैं, उनके साथ (जज्ञिषे) प्रकट होते हो, उन (वृषन्तमस्य) अत्यन्त बलिष्ठ (ते) आपके (वरेण्यम्) अतीव उत्तम (अवः) रक्षण आदि कर्म्म को हम लोग (आ, हूमहे) उत्तम प्रकार से स्वीकार करते हैं ॥३॥
Essence
हे राजन् ! जिससे आप उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाववाले हो और पितृजन जैसे सन्तानों को वैसे हम लोगों का पालन करते हो, इससे आपको राजा हम लोग मानते हैं ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥