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Rigveda Mandal 5 / Sukta 35 / Mantra 1

87 Sukta
8 Mantra
5/35/1
Devata- इन्द्र: Rishi- संवरणः प्राजापत्यः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
यस्ते॒ साधि॒ष्ठोऽव॑स॒ इन्द्र॒ क्रतु॒ष्टमा भ॑र। अ॒स्मभ्यं॑ चर्षणी॒सहं॒ सस्निं॒ वाजे॑षु दु॒ष्टर॑म् ॥१॥

यः । ते॒ । साधि॑ष्ठः । अव॑से । इन्द्र॑ । क्रतुः॑ । टम् । आ । भ॒र॒ । अ॒स्मभ्य॑म् । च॒र्ष॒णि॒ऽसह॑म् । सस्नि॑म् । वाजे॑षु । दु॒स्तर॑म् ॥

Mantra without Swara
यस्ते साधिष्ठोऽवस इन्द्र क्रतुष्टमा भर। अस्मभ्यं चर्षणीसहं सस्निं वाजेषु दुष्टरम् ॥

यः। ते। साधिष्ठः। अवसे। इन्द्र। क्रतुः। तम्। आ। भर। अस्मभ्यम्। चर्षणिऽसहम्। सस्निम्। वाजेषु। दुस्तरम् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 5 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सूर्य्य के सदृश न्याय से प्रकाशित राजन् (यः) जो (ते) आपकी (अवसे) रक्षा आदि के लिये (साधिष्ठः) अत्यन्त श्रेष्ठ (क्रतुः) बुद्धि है (तम्) उस (चर्षणीसहम्) मनुष्यों को सहनेवाले (सस्निम्) ब्रह्मचर्य्यव्रत और विद्या के ग्रहण से पवित्र (वाजेषु) और संग्रामों में (दुष्टरम्) दुःख से उल्लङ्घन करने योग्य को (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (आ, भर) सब प्रकार धारण करिये ॥१॥
Essence
वही राजा उत्तम होवे जो दीर्घ ब्रह्मचर्य्य से यथार्थवक्ता जनों से विद्या और विनय को ग्रहण करके न्याय से राज्य की शिक्षा देवे ॥१॥
Subject
अब आठ ऋचावाले पैंतीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुणों का वर्णन करते हैं ॥