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Rigveda Mandal 5 / Sukta 34 / Mantra 8

87 Sukta
9 Mantra
5/34/8
Devata- इन्द्र: Rishi- संवरणः प्राजापत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
सं यज्जनौ॑ सु॒धनौ॑ वि॒श्वश॑र्धसा॒ववे॒दिन्द्रो॑ म॒घवा॒ गोषु॑ शु॒भ्रिषु॑। युजं॒ ह्य१॒॑न्यमकृ॑त प्रवेप॒न्युदीं॒ गव्यं॑ सृजते॒ सत्व॑भि॒र्धुनिः॑ ॥८॥

सम् । यत् । जनौ॑ । सु॒ऽधनौ॑ । वि॒श्वऽश॑र्धसौ । अवे॑त् । इन्द्रः॑ । म॒घऽवा॑ । गोषु॑ । शु॒भ्रिषु॑ । युज॑म् । हि । अ॒न्यम् । अकृ॑त । प्र॒ऽवे॒प॒नी । उत् । ई॒म् । गव्य॑म् । सृ॒ज॒ते॒ । सत्व॑ऽभिः । धुनिः॑ ॥

Mantra without Swara
सं यज्जनौ सुधनौ विश्वशर्धसाववेदिन्द्रो मघवा गोषु शुभ्रिषु। युजं ह्य१न्यमकृत प्रवेपन्युदीं गव्यं सृजते सत्वभिर्धुनिः ॥

सम्। यत्। जनौ। सुऽधनौ। विश्वऽशर्धसौ। अवेत्। इन्द्रः। मघऽवा। गोषु। शुभ्रिषु। युजम्। हि। अन्यम्। अकृत। प्रऽवेपनी। उत्। ईम्। गव्यम्। सृजते। सत्त्वऽभिः। धुनिः ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 3

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो (धुनिः) कंपनेवाला (मघवा) अत्यन्त श्रेष्ठ बहुत धन से युक्त (इन्द्रः) राजा और (यत्) जो (सुधनौ) धर्म्म से उत्पन्न हुए श्रेष्ठ धन से तथा (विश्वशर्धसौ) सम्पूर्ण बल से युक्त (जनौ) दो जनों को (सम्, अवेत्) अच्छे प्रकार प्राप्त होवे और (शुभ्रिषु) उत्तम गुणवाले (गोषु) धेनु और पृथिवी आदिकों में (हि) जिससे (युजम्) युक्त (अन्यम्) अन्य को (अकृत) करता है और (प्रवेपनी) चलती हुई (गव्यम्) गौओं के लिये हितकारक (ईम्) जल को (सत्त्वभिः) पदार्थों से (उत्, सृजते) उत्पन्न करता है, वह सुख करनेवाला होता है ॥८॥
Essence
राजा को चाहिये कि अपने राज्य में उत्तम धनी, विद्वान् तथा अध्यापक और उपदेशकों की उत्तम प्रकार रक्षा करके उनसे व्यवहार धन और विद्या की उन्नति करे ॥८॥
Subject
फिर पूर्वोक्त विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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