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Rigveda Mandal 5 / Sukta 34 / Mantra 7

87 Sukta
9 Mantra
5/34/7
Devata- इन्द्र: Rishi- संवरणः प्राजापत्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
समीं॑ प॒णेर॑जति॒ भोज॑नं मु॒षे वि दा॒शुषे॑ भजति सू॒नरं॒ वसु॑। दु॒र्गे च॒न ध्रि॑यते॒ विश्व॒ आ पु॒रु जनो॒ यो अ॑स्य॒ तवि॑षी॒मचु॑क्रुधत् ॥७॥

सम् । ई॒म् । प॒णेः । अ॒ज॒ति॒ । भोज॑नम् । मु॒षे । वि । दा॒शुषे॑ । भ॒ज॒ति॒ । सू॒नर॑म् । वसु॑ । दुः॒ऽगे । च॒न । ध्रि॒य॒ते॒ । विश्वः॑ । आ । पु॒रु । जनः॑ । यः । अ॒स्य॒ । तवि॑षीम् । अचु॑क्रुधत् ॥

Mantra without Swara
समीं पणेरजति भोजनं मुषे वि दाशुषे भजति सूनरं वसु। दुर्गे चन ध्रियते विश्व आ पुरु जनो यो अस्य तविषीमचुक्रुधत् ॥

सम्। ईम्। पणेः। अजति। भोजनम्। मुषे। वि। दाशुषे। भजति। सूनरम्। वसु। दुःऽगे। चन। ध्रियते। विश्वः। आ। पुरु। जनः। यः। अस्य। तविषीम्। अचुक्रुधत् ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 2

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Meaning
हे राजन् ! जो (पणेः) स्तुति किये गये के (भोजनम्) पालन वा अन्न आदि को (अजति) प्राप्त होता और (मुषे) चोर के लिये दण्ड को और (दाशुषे) दानशील के लिये दान (चन) भी (सम्) उत्तम प्रकार (वि, भजति) बाँटता है तथा (यः) जो (अस्य) इस शत्रुजन की (तविषीम्) सेना को (अचुक्रुधत्) अत्यन्त क्रुद्धित करता है वह (ईम्) सब प्रकार से (विश्वः) सम्पूर्ण (जनः) मनुष्य (दुर्गे) दुःख से प्राप्त होने योग्य व्यवहार वा उत्तम कोट में (पुरु) बहुत (सूनरम्) उत्तम मनुष्य जिसमें उस (वसु) धन का (आ) सेवन करता है और राजा से (ध्रियते) धारण किया जाता है ॥७॥
Essence
जो राजा चोर, डाकू आदि जनों के लिये कठिन दण्ड और श्रेष्ठ जनों के लिये प्रतिष्ठा देता है, उसका राज्य धन आदि से युक्त हुआ वृद्धि को प्राप्त होता और उसका इस संसार में यश और परलोक में सुख होता है ॥७॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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