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Rigveda Mandal 5 / Sukta 34 / Mantra 6

87 Sukta
9 Mantra
5/34/6
Devata- इन्द्र: Rishi- संवरणः प्राजापत्यः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
वि॒त्वक्ष॑णः॒ समृ॑तौ चक्रमास॒जोऽसु॑न्वतो॒ विषु॑णः सुन्व॒तो वृ॒धः। इन्द्रो॒ विश्व॑स्य दमि॒ता वि॒भीष॑णो यथाव॒शं न॑यति॒ दास॒मार्यः॑ ॥६॥

वि॒ऽत्वक्ष॑णः । सम्ऽऋ॑तौ । च॒क्र॒म्ऽआ॒स॒जः । असु॑न्वतः । विषु॑णः । सु॒न्व॒तः । वृ॒धः । इन्द्रः॑ । विश्व॑स्य । द॒मि॒ता । वि॒ऽभीष॑णः । य॒था॒ऽव॒शम् । न॒य॒ति॒ । दास॑म् । आर्यः॑ ॥

Mantra without Swara
वित्वक्षणः समृतौ चक्रमासजोऽसुन्वतो विषुणः सुन्वतो वृधः। इन्द्रो विश्वस्य दमिता विभीषणो यथावशं नयति दासमार्यः ॥

विऽत्वक्षणः। सम्ऽऋतौ। चक्रऽआसजः। असुन्वतः। विषुणः। सुन्वतः। वृधः। इन्द्रः। विश्वस्य। दमिता। विऽभीषणः। यथाऽवशम्। नयति। दासम्। आर्यः ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 4 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे (वृधः) बढ़ानेवाला (इन्द्रः) बिजुली के सदृश राजा (विश्वस्य) सम्पूर्ण जगत् का (दमिता) दमन करने और (विभीषणः) भय देनेवाला है, वैसे (वित्वक्षणः) विशेष करके दुःख का नाश करनेवाला (समृतौ) संग्राम में (चक्रमासजः) कालरूप चक्र के महीनों से उत्पन्न हुआ जन (विषुणः) विद्या में व्याप्त और (सुन्वतः) यज्ञ करने और (असुन्वतः) नहीं यज्ञ करनेवाले का दमन करनेवाला होता हुआ (आर्यः) ब्राह्मण, क्षत्रिय वा वैश्य वर्ण आर्य्य राजा (यथावशम्) यथाशक्ति (दासम्) सेवक शूद्र को (नयति) प्राप्त करता है ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आर्यों तथा उत्तम गुण, कर्म्म और स्वभाववालों का शूद्र सेवक होता है, वैसे ही उत्तम गुण और कर्म्म से युक्त राजा की प्रजा सेवन करनेवाली होती है ॥६॥
Subject
अब इन्द्र के सादृश्य से राजगुणों को कहते हैं ॥