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Rigveda Mandal 5 / Sukta 34 / Mantra 2

87 Sukta
9 Mantra
5/34/2
Devata- इन्द्र: Rishi- संवरणः प्राजापत्यः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
आ यः सोमे॑न ज॒ठर॒मपि॑प्र॒ताम॑न्दत म॒घवा॒ मध्वो॒ अन्ध॑सः। यदीं॑ मृ॒गाय॒ हन्त॑वे म॒हाव॑धः स॒हस्र॑भृष्टिमु॒शना॑ व॒धं यम॑त् ॥२॥

आ । यः । सोमे॑न । ज॒ठर॑म् । अपि॑प्रत । अम॑न्दत । म॒घऽवा॑ । मध्वः॑ । अन्ध॑सः । यत् । ई॒म् । मृ॒गाय॑ । हन्त॑वे । म॒हाऽव॑धः । स॒हस्र॑ऽभृष्टिम् । उ॒शना॑ । व॒धम् । यम॑त् ॥

Mantra without Swara
आ यः सोमेन जठरमपिप्रतामन्दत मघवा मध्वो अन्धसः। यदीं मृगाय हन्तवे महावधः सहस्रभृष्टिमुशना वधं यमत् ॥

आ। यः। सोमेन। जठरम्। अपिप्रत। अमन्दत। मघऽवा। मध्वः। अन्धसः। यत्। ईम्। मृगाय। हन्तवे। महाऽवधः। सहस्रऽभृष्टिम्। उशना। वधम्। यमत् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 3 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! (यः) जो (उशना) कामना करता हुआ (मघवा) बहुत धन से युक्त (सोमेन) सोमलता से उत्पन्न रस से (जठरम्) उदर की अग्नि को (आ, अपिप्रत) अच्छे प्रकार पूर्ण करे और (मध्वः) मधुर आदि गुणों से युक्त (अन्धसः) अन्न आदि का भोग करके (अमन्दत) आनन्द करे और (यत्) जो (महावधः) अत्यन्त नाश करनेवाला (मृगाय) हरिण को (हन्तवे) मारने के लिये (सहस्रभृष्टिम्) हजारों दहन जिससे उस (वधम्) वध को (ईम्) सब प्रकार से (यमत्) देवे, वह सब सुख को प्राप्त होता है ॥२॥
Essence
जो मनुष्य वैद्यकशास्त्र की रीति से सोमलता आदि ओषधियों के रस के साथ संस्कारयुक्त किये गये अन्नों का भोग करते हैं, वे अतुल सुख को प्राप्त होते हैं ॥२॥
Subject
अब विद्वद्विषय में पाक के गुणों को कहते हैं ॥