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Rigveda Mandal 5 / Sukta 33 / Mantra 9

87 Sukta
10 Mantra
5/33/9
Devata- इन्द्र: Rishi- संवरणः प्राजापत्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उ॒त त्ये मा॑ मारु॒ताश्व॑स्य॒ शोणाः॒ क्रत्वा॑मघासो वि॒दथ॑स्य रा॒तौ। स॒हस्रा॑ मे॒ च्यव॑तानो॒ ददा॑न आनू॒कम॒र्यो वपु॑षे॒ नार्च॑त् ॥९॥

उ॒त । त्ये । मा॒ । मा॒रु॒तऽअ॑श्वस्य । शोणाः॑ । क्रत्वा॑ऽमघासः । वि॒दथ॑स्य । रा॒तौ । स॒हस्रा॑ । मे॒ । च्यव॑तानः । ददा॑नः । आ॒नू॒कम् । अ॒र्यः । वपु॑षे । न । आ॒र्च॒त् ॥

Mantra without Swara
उत त्ये मा मारुताश्वस्य शोणाः क्रत्वामघासो विदथस्य रातौ। सहस्रा मे च्यवतानो ददान आनूकमर्यो वपुषे नार्चत् ॥

उत। त्ये। मा। मारुतऽअश्वस्य। शोणाः। क्रत्वाऽमघासः। विदथस्य। रातौ। सहस्रा। मे। च्यवतानः। ददानः। आनूकम्। अर्यः। वपुषे। न। आर्चत् ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो (क्रत्वामघासः) बुद्धि वा कर्म्म ही है धन जिनका वे (शोणाः) रक्त गुण से विशिष्ट जन और (मारुताश्वस्य) पवनों के सदृश घोड़ों के सम्बन्धी (विदथस्य) प्राप्त होने योग्य (मे) मेरे वा मेरे लिये (रातौ) दान में (सहस्रा) हजारों को (च्यवतानः) प्राप्त होता हुआ जन (उत) भी सुख देने को समर्थ हों (त्ये) वे और जो (ददानः) देता हुआ (वपुषे) सुन्दर शरीर के लिये (मा) मुझ को (आनूकम्) अनुकूलतापूर्वक (आर्चत्) आदरयुक्त करे वह (अर्य्यः) स्वामी भी सब प्रकार से तिरस्कृत (न) नहीं होता है ॥९॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो हम लोगों के अभीष्ट की सिद्धि करते हैं, उनके अभीष्ट की हम लोग भी सिद्धि करें, इस प्रकार स्वामी और सेवक भी वर्त्ताव करें ॥९॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥