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Rigveda Mandal 5 / Sukta 33 / Mantra 4

87 Sukta
10 Mantra
5/33/4
Devata- इन्द्र: Rishi- संवरणः प्राजापत्यः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
पु॒रू यत्त॑ इन्द्र॒ सन्त्यु॒क्था गवे॑ च॒कर्थो॒र्वरा॑सु॒ युध्य॑न्। त॒त॒क्षे सूर्या॑य चि॒दोक॑सि॒ स्वे वृषा॑ स॒मत्सु॑ दा॒सस्य॒ नाम॑ चित् ॥४॥

पु॒रु । यत् । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । सन्ति॑ । उ॒क्था । गवे॑ । च॒कर्थ॑ । उ॒र्वरा॑सु । युध्य॑न् । त॒त॒क्षे । सूर्या॑य । चि॒त् । ओक॑सि । स्वे । वृषा॑ । स॒मत्ऽसु॑ । दा॒सस्य॑ । नाम॑ । चि॒त् ॥

Mantra without Swara
पुरू यत्त इन्द्र सन्त्युक्था गवे चकर्थोर्वरासु युध्यन्। ततक्षे सूर्याय चिदोकसि स्वे वृषा समत्सु दासस्य नाम चित् ॥

पुरु। यत्। ते। इन्द्र। सन्ति। उक्था। गवे। चकर्थ। उर्वरासु। युध्यन्। ततक्षे। सूर्याय। चित्। ओकसि। स्वे। वृषा। समत्ऽसु। दासस्य। नाम। चित् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 1 Mantra » 4

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Meaning
हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य्य से युक्त (वृषा) बलिष्ठ होते हुए आप (ते) आपके (यत्) जो (पुरु) बहुत (उक्था) प्रशंसित कर्म्म (गवे) गौ आदि पशुओं के हित के लिये (सन्ति) हैं उनको (उर्वरासु) भूमियों में और (समत्सु) सङ्ग्रामों में (युध्यन्) युद्ध करते हुए (चकर्थ) करें और शत्रुओं को (ततक्षे) सूक्ष्म अर्थात् निर्बल करते हो और (सूर्य्याय) सूर्य्य के सदृश वर्त्तमान के लिये (चित्) भी (स्वे) अपने (ओकसि) गृह में (दासस्य) दास के (चित्) निश्चित (नाम) नाम को प्रकट कीजिये ॥४॥
Essence
हे राजन् ! जितनी उत्तम सामग्रियाँ होवें, उनको सेना में युद्ध के लिये स्थापित कीजिये और जो गृह के लिये वस्तु होवें, उनको गृह में स्थापित कीजिये ॥४॥
Subject
फिर इन्द्र के गुणों को कहते हैं ॥

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