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Rigveda Mandal 5 / Sukta 33 / Mantra 2

87 Sukta
10 Mantra
5/33/2
Devata- इन्द्र: Rishi- गातुरात्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स त्वं न॑ इन्द्र धियसा॒नो अ॒र्कैर्हरी॑णां वृष॒न्योक्त्र॑मश्रेः। या इ॒त्था म॑घव॒न्ननु॒ जोषं॒ वक्षो॑ अ॒भि प्रार्यः स॑क्षि॒ जना॑न् ॥२॥

सः । त्वम् । नः॒ । इ॒न्द्र॒ । धि॒य॒सा॒नः । अ॒र्कैः । हरी॑णाम् । वृ॒ष॒न् । योक्त्र॑म् । अ॒श्रेः॒ । याः । इ॒त्था । म॒घ॒ऽव॒न् । अनु॑ । जोष॑म् । वक्षः॑ । अ॒भि । प्र । अ॒र्यः । स॒क्षि॒ । जना॑न् ॥

Mantra without Swara
स त्वं न इन्द्र धियसानो अर्कैर्हरीणां वृषन्योक्त्रमश्रेः। या इत्था मघवन्ननु जोषं वक्षो अभि प्रार्यः सक्षि जनान् ॥

सः। त्वम्। नः। इन्द्र। धियसानः। अर्कैः। हरीणाम्। वृषन्। योक्त्रम्। अश्रेः। याः। इत्था। मघऽवन्। अनु। जोषम्। वक्षः। अभि। प्र। अर्यः। सक्षि। जनान् ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 1 Mantra » 2

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Meaning
हे (वृषन्) सुख की वृष्टि करते हुए (मघवन्) अत्युत्तम धन से युक्त और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले (सः) वह (धियसानः) ध्यान करता हुआ (अर्यः) स्वामी राजा (त्वम्) आप (अर्कैः) विचारों से (नः) हम लोगों के वा हम लोगों को (हरीणाम्) मनुष्यों के सम्बन्ध में (योक्त्रम्) एकत्र करने का (अश्रेः) सेवन कीजिये और (याः) जो उत्तम नीतियाँ हैं उनकी (जोषम्) प्रीति को (अनु, वक्षः) अनुकूल प्राप्त हूजिये (इत्था) इस प्रकार से (जनान्) मनुष्यों को (अभि, प्र, सक्षि) अच्छे प्रकार सम्बन्धित करते हो ॥२॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । वही उत्तम विद्वान् है, जो मनुष्यों की बुद्धि को योगाभ्यास आदि से बढ़ावे और सब काल में नीति के अनुसार कर्म्म करके प्रजाओं को प्रसन्न करे ॥२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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