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Rigveda Mandal 5 / Sukta 33 / Mantra 10

87 Sukta
10 Mantra
5/33/10
Devata- इन्द्र: Rishi- संवरणः प्राजापत्यः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ॒त त्ये मा॑ ध्व॒न्य॑स्य॒ जुष्टा॑ लक्ष्म॒ण्य॑स्य सु॒रुचो॒ यता॑नाः। म॒ह्ना रा॒यः सं॒वर॑णस्य॒ ऋषे॑र्व्र॒जं न गावः॒ प्रय॑ता॒ अपि॑ ग्मन् ॥१०॥

उ॒त । त्ये । मा॒ । ध्व॒न्य॑स्य । जुष्टाः॑ । ल॒क्ष्म॒ण्य॑स्य । सु॒ऽरुचः॑ । यता॑नाः । म॒ह्ना । रा॒यः । स॒म्ऽवर॑णस्य । ऋषेः॑ । व्र॒जम् । न । गावः॑ । प्रऽय॑ताः । अपि॑ । ग्म॒न् ॥

Mantra without Swara
उत त्ये मा ध्वन्यस्य जुष्टा लक्ष्मण्यस्य सुरुचो यतानाः। मह्ना रायः संवरणस्य ऋषेर्व्रजं न गावः प्रयता अपि ग्मन् ॥

उत। त्ये। मा। ध्वन्यस्य। जुष्टाः। लक्ष्मण्यस्य। सुऽरुचः। यतानाः। मह्ना। रायः। संऽवरणस्य। ऋषेः। व्रजम्। न। गावः। प्रऽयताः। अपि। ग्मन् ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 2 Varga » 2 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
जो (ध्वन्यस्य) ध्वनियों में कुशल और (संवरणस्य) स्वीकार किये हुए (रायः) धन के (मह्ना) महत्त्व से (उत) और (लक्ष्मण्यस्य) श्रेष्ठ लक्षणों में उत्पन्न (ऋषेः) मन्त्रों के अर्थ जाननेवाले के सम्बन्ध में (प्रयताः) प्रयत्न करते हुए जन हैं (त्ये) वे (गावः) गौवें (व्रजम्) गोष्ठ को (न) जैसे (अपि) निश्चित (ग्मन्) जाती हैं, वैसे महत्त्व से (मा) मुझ को भी प्राप्त होते हैं और जो (यतानाः) यत्न करती हुई (सुरुचः) उत्तम प्रीतिवाली मुझ को (जुष्टाः) प्रसन्नतापूर्वक प्राप्त हैं, उनको सब प्राप्त होवें ॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । जो मनुष्य प्रयत्न से नहीं प्राप्त हुए की प्राप्ति और प्राप्त हुए की रक्षा करते हैं, वे जैसे बछड़ों को गौवें वैसे धन को प्राप्त होते हैं ॥१०॥ इस सूक्त में इन्द्र और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तेंतीसवाँ सूक्त और द्वितीय वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥