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Rigveda Mandal 5 / Sukta 32 / Mantra 4

87 Sukta
12 Mantra
5/32/4
Devata- इन्द्र: Rishi- गातुरात्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्यं चि॑देषां स्व॒धया॒ मद॑न्तं मि॒हो नपा॑तं सु॒वृधं॑ तमो॒गाम्। वृष॑प्रभर्मा दान॒वस्य॒ भामं॒ वज्रे॑ण व॒ज्री नि ज॑घान॒ शुष्ण॑म् ॥४॥

त्यम् । चि॒त् । ए॒षा॒म् । स्व॒धया॑ । मद॑न्तम् । मि॒हः । नपा॑तम् । सु॒ऽवृध॑म् । त॒मः॒ऽगाम् । वृष॑ऽप्रभर्मा । दा॒न॒वस्य॑ । भाम॑म् । वज्रे॑ण । व॒ज्री । नि । ज॒घा॒न॒ । शुष्ण॑म् ॥

Mantra without Swara
त्यं चिदेषां स्वधया मदन्तं मिहो नपातं सुवृधं तमोगाम्। वृषप्रभर्मा दानवस्य भामं वज्रेण वज्री नि जघान शुष्णम् ॥

त्यम्। चित्। एषाम्। स्वधया। मदन्तम्। मिहः। नपातम्। सुऽवृधम्। तमःऽगाम्। वृषऽप्रभर्मा। दानवस्य। भामम्। वज्रेण। वज्री। नि। जघान। शुष्णम् ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 32 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे सेना के ईश वीरपुरुष ! आप (एषाम्) इन वीरों के मध्य में (स्वधया) अन्न आदि से (मदन्तम्) प्रसन्न होता हुआ जो जीव (त्यम्) उसके (चित्) समान जैसे (वृषप्रभर्मा) वर्षनेवाले मेघ को धारण करनेवाला सूर्य्य (मिहः) वृष्टि के (नपातम्) नहीं गिरनेवाले (सुवृधम्) सुन्दर बढ़ते हुए (तमोगाम्) अन्धकार को प्राप्त अर्थात् सघनघन मेघ को (जघान) नाश करे, वैसे (वज्री) उत्तम शस्त्र और अस्त्रों से युक्त होते हुए (वज्रेण) तीव्र शस्त्र से (दानवस्य) दुष्टजन के (शुष्णम्) सुखानेवाले बलवान् (भामम्) क्रोध को (नि) निरन्तर नाश करिये ॥४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं । हे राजन् ! जैसे सूर्य्य अति विस्तारयुक्त मेघ का नाश कर भूमि में गिरा के जगत् की रक्षा करता है, वैसे ही अतिप्रबल भी शत्रुओं का नाश कर नीचे गिरा के न्याय से प्रजाओं का पालन कीजिये ॥४॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥