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Rigveda Mandal 5 / Sukta 32 / Mantra 10

87 Sukta
12 Mantra
5/32/10
Devata- इन्द्र: Rishi- गातुरात्रेयः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
न्य॑स्मै दे॒वी स्वधि॑तिर्जिहीत॒ इन्द्रा॑य गा॒तुरु॑श॒तीव॑ येमे। सं यदोजो॑ यु॒वते॒ विश्व॑माभि॒रनु॑ स्व॒धाव्ने॑ क्षि॒तयो॑ नमन्त ॥१०॥

नि । अ॒स्मै॒ । दे॒वी । स्वऽधि॑तिः । जि॒ही॒ते॒ । इन्द्रा॑य । गा॒तुः । उ॒श॒तीऽइ॑व । ये॒मे॒ । सम् । यत् । ओजः॑ । यु॒वते॑ । विश्व॑म् । आ॒भिः॒ । अनु॑ । स्व॒धाऽव्ने॑ । क्षि॒तयः॑ । न॒म॒न्त॒ ॥

Mantra without Swara
न्यस्मै देवी स्वधितिर्जिहीत इन्द्राय गातुरुशतीव येमे। सं यदोजो युवते विश्वमाभिरनु स्वधाव्ने क्षितयो नमन्त ॥

नि। अस्मै। देवी। स्वऽधितिः। जिहीते। इन्द्राय। गातुः। उशतीऽइव। येमे। सम्। यत्। ओजः। युवते। विश्वम्। आभिः। अनु। स्वधाऽव्ने। क्षितयः। नमन्त ॥१०॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 33 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (युवते) युवावस्था को प्राप्त हुई (स्वधितिः) वज्र के सदृश (देवी) विदुषी तुम (अस्मै) इस (इन्द्राय) ऐश्वर्य्य के लिये यह दो स्त्रियाँ (गातुः) भूमि और (उशतीव) कामना करती हुई स्त्री के समान (यत्) जैसे (ओजः) वीर्य को उत्तम प्रकार ग्रहण करके (सम्, नि, येमे) अच्छे प्रकार नियम में रखती और (आभिः) इन क्रियाओं से (स्वधाव्ने) धन को धारण करनेवाले के लिये (विश्वम्) समस्त व्यवहार को (अनु, जिहीते) अनुकूल चलाती हैं तथा जैसे (क्षितयः) मनुष्य (नमन्त) नम्र होते हैं, वैसे आप होइये ॥१०॥
Essence
जैसे बह्मचर्य्य को धारण को हुई ब्रह्मचारिणी कन्या पूर्ण चौबीस वर्ष की अवस्था से युक्त हुई पति की कामना करती हुई गुण, कर्म्म और स्वभाव के सदृश और प्रिय स्वामी का ग्रहण करती है, वैसे ही बिजुली आदि रूप अग्नि सम्पूर्ण संसार को धारण करता है और जैसे गुणवान् जनों को मनुष्य नमते हैं, वैसे ही उत्तम लक्षणों से युक्त स्त्री-पुरुषों को सम्पूर्ण जन नमते हैं ॥१०॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को कहते हैं ॥