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Rigveda Mandal 5 / Sukta 32 / Mantra 1

87 Sukta
12 Mantra
5/32/1
Devata- इन्द्र: Rishi- अमहीयुः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अद॑र्द॒रुत्स॒मसृ॑जो॒ वि खानि॒ त्वम॑र्ण॒वान्ब॑द्बधा॒नाँ अ॑रम्णाः। म॒हान्त॑मिन्द्र॒ पर्व॑तं॒ वि यद्वः सृ॒जो वि धारा॒ अव॑ दान॒वं ह॑न् ॥१॥

अद॑र्दः । उत्स॑म् । असृ॑जः । वि । खानि॑ । त्वम् । अ॒र्ण॒वान् । ब॒द्ब॒धा॒नान् । अर॑म्णाः । म॒हान्त॑म् । इ॒न्द्र॒ । पर्व॑तम् । वि । यत् । वरिति॒ वः । सृ॒जः । वि । धाराः॑ । अव॑ । दा॒न॒वम् । ह॒न्निति॑ हन् ॥

Mantra without Swara
अदर्दरुत्समसृजो वि खानि त्वमर्णवान्बद्बधानाँ अरम्णाः। महान्तमिन्द्र पर्वतं वि यद्वः सृजो वि धारा अव दानवं हन् ॥

अदर्दः। उत्सम्। असृजः। वि। खानि। त्वम्। अर्णवान्। बद्बधानान्। अरम्णाः। महान्तम्। इन्द्र। पर्वतम्। वि। यत्। वरिति वः। सृजः। वि। धाराः। अव। दानवम्। हन्निति हन् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 32 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) शत्रुओं के नाश करनेवाले राजन् ! जिस प्रकार सूर्य्य (उत्सम्) कूप के समान (महान्तम्) बड़े (पर्वतम्) पर्वताकार मेघ का नाश करके (बद्बधानान्) अत्यन्त बंधे हुओं को (अदर्दः) नाश कता है और (अर्णवान्) नदियों वा समुद्रों का (सृजः) त्याग करता है, वैसे (त्वम्) आप (खानि) इन्द्रियों को (वि) विशेष करके त्याग कीजिये और हम लोगों का (वि, अरम्णाः) विशेष रमण कराइये और (यत्) जो सूर्य्य (धाराः) जल के प्रवाहों के सदृश वाणियों का और (दानवम्) दुष्ट जन का (अव, हन्) नाश करता है (वः) आप लोगों के लिये (वि, असृजः) विशेषकर त्यागता अर्थात् जलादि का त्याग करता है, उसका सत्कार प्रशंसा उत्तम किया कीजिये ॥१॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । राजा जैसे सूर्य्य गिराये हुए मेघ से नदी और समुद्र आदिकों को पूर्ण करता और तटों को तोड़ता है, वैसे ही अन्याय को गिरा और न्याय से प्रजा का पालन करके दुष्टों का नाश करें ॥१॥
Subject
अब बारह ऋचावाले बत्तीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुणों को कहते हैं ॥