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Rigveda Mandal 5 / Sukta 31 / Mantra 9

87 Sukta
13 Mantra
5/31/9
Devata- इन्द्र: Rishi- अमहीयुः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इन्द्रा॑कुत्सा॒ वह॑माना॒ रथे॒ना वा॒मत्या॒ अपि॒ कर्णे॑ वहन्तु। निः षी॑म॒द्भ्यो धम॑थो॒ निः ष॒धस्था॑न्म॒घोनो॑ हृ॒दो व॑रथ॒स्तमां॑सि ॥९॥

इन्द्रा॑कुत्सा । वह॑माना । रथे॑न । आ । वा॒म् । अत्याः॑ । अपि॑ । कर्णे॑ । व॒ह॒न्तु॒ । निः । सी॒म् । अ॒त्ऽभ्यः । धम॑थः । निः । स॒धऽस्था॑त् । म॒घोनः॑ । हृ॒दः । व॒र॒थः॒ । तमां॑सि ॥

Mantra without Swara
इन्द्राकुत्सा वहमाना रथेना वामत्या अपि कर्णे वहन्तु। निः षीमद्भ्यो धमथो निः षधस्थान्मघोनो हृदो वरथस्तमांसि ॥

इन्द्राकुत्सा। वहमाना। रथेन। आ। वाम्। अत्याः। अपि। कर्णे। वहन्तु। निः। सीम्। अत्ऽभ्यः। धमथः। निः। सधऽस्थात्। मघोनः। हृदः। वरथः। तमांसि ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 30 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे अध्यापको और उपदेशको ! जैसे (इन्द्राकुत्सा) बिजुली और बिजुली का आघात (रथेन) वाहन से (वहमाना) प्राप्त कराते हुए वर्त्तमान हैं वा विद्वान् जन (कर्णे) करते हैं जिससे उसमें (वाम्) आप दोनों को (आ, वहन्तु) पहुँचावें वैसे (अत्याः) निरन्तर चलनेवाले घोड़े (अपि) भी सब को प्राप्त कराने को समर्थ होते हैं और जो बिजुली और अग्नि (अद्भ्यः) जलों से (निः, धमथः) शब्द करते हैं तो वे दोनों (सधस्थात्) तुल्य स्थान से (सीम्) सब प्रकार प्राप्त कराते और जो (हृदः) हृदयों के सदृश प्रिय (मघोनः) धनाढ्य पुरुषों का (निः) अत्यन्त (वरथः) स्वीकार करते हैं तो सुख से (तमांसि) अन्धकारों को हटाने को समर्थ होओ ॥९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो अग्नि और जल का संयोग कर शब्द कर और भाफ से यन्त्र कलाओं को ताड़ित करके वाहनादिकों को चलावें तो आप अपने को और मित्रों को धन से युक्त करके दुःखों के पार जावें और अन्यों को भी पार करें ॥९॥
Subject
अब यन्त्रकलाविषय शिल्पकर्म को कहते हैं ॥