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Rigveda Mandal 5 / Sukta 31 / Mantra 8

87 Sukta
13 Mantra
5/31/8
Devata- इन्द्र: Rishi- अमहीयुः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्वम॒पो यद॑वे तु॒र्वशा॒यार॑मयः सु॒दुघाः॑ पा॒र इ॑न्द्र। उ॒ग्रम॑यात॒मव॑हो ह॒ कुत्सं॒ सं ह॒ यद्वा॑मु॒शनार॑न्त दे॒वाः ॥८॥

त्वम् । अ॒पः । यद॑वे । तु॒र्वशा॒य । अर॑मयः । सु॒ऽदुघाः॑ । पा॒रः । इ॒न्द्र॒ । उ॒ग्रम् । अ॒या॒त॒म् । अव॑हः । ह॒ । कुत्स॑म् । सम् । ह॒ । यत् । वा॒म् । उ॒शना॑ । अर॑न्त । दे॒वाः ॥

Mantra without Swara
त्वमपो यदवे तुर्वशायारमयः सुदुघाः पार इन्द्र। उग्रमयातमवहो ह कुत्सं सं ह यद्वामुशनारन्त देवाः ॥

त्वम्। अपः। यदवे। तुर्वशाय। अरमयः। सुऽदुघाः। पारः। इन्द्र। उग्रम्। अयातम्। अवहः। ह। कुत्सम्। सम्। ह। यत्। वाम्। उशना। अरन्त। देवाः ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 30 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्यदाता ! (पारः) पार लगानेवाले होते हुए (त्वम्) आप (तुर्वशाय) शीघ्र वश करने में समर्थ (यदवे) मनुष्य के लिये (सुदुघाः) उत्तम प्रकार पूर्ण करने योग्य (अपः) जलों के सदृश कर्म्मों को (अरमयः) रमावें और (उग्रम्) बड़े कष्ट से जिसको जीत सकें उस (अयातम्) न आये हुए (कुत्सम्) कुत्सित को (ह) निश्चय (सम्, अवहः) अच्छे प्रकार प्राप्त होवें तथा (यत्) जिसमें (उशना) कामना करते हुए (देवाः) विद्वान् जन (अरन्त) रमें, उसमें (ह) निश्चय (सम्, अवहः) अच्छे प्रकार प्राप्त होवें तथा (यत्) जिसमें (उशना) कामना करते हुए (देवाः) विद्वान् जन (अरन्त) रमें उसमें (ह) निश्चय (वाम्) आप दोनों अर्थात् आप को और पूर्वोक्त मनुष्य को रमावें ॥८॥
Essence
ऐश्वर्य्यवाला मनुष्य अन्य जनों के लिये धन और धान्य आदिक देवें और जहाँ विद्वान् रमें, वहाँ ही सम्पूर्ण जन क्रीड़ा करें ॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥