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Rigveda Mandal 5 / Sukta 31 / Mantra 6

87 Sukta
13 Mantra
5/31/6
Devata- इन्द्र: Rishi- अमहीयुः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र ते॒ पूर्वा॑णि॒ कर॑णानि वोचं॒ प्र नूत॑ना मघव॒न्या च॒कर्थ॑। शक्ती॑वो॒ यद्वि॒भरा॒ रोद॑सी उ॒भे जय॑न्न॒पो मन॑वे॒ दानु॑चित्राः ॥६॥

प्र । ते॒ । पूर्वा॑णि । कर॑णानि । वो॒च॒म् । प्र । नूत॑ना । म॒घ॒ऽव॒न् । या । च॒कर्थ॑ । शक्ति॑ऽवः । यत् । वि॒ऽभराः॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । उ॒भे इति॑ । जय॑न् । अ॒पः । मन॑वे । दानु॑ऽचित्राः ॥

Mantra without Swara
प्र ते पूर्वाणि करणानि वोचं प्र नूतना मघवन्या चकर्थ। शक्तीवो यद्विभरा रोदसी उभे जयन्नपो मनवे दानुचित्राः ॥

प्र। ते। पूर्वाणि। करणानि। वोचम्। प्र। नूतना। मघऽवन्। या। चकर्थ। शक्तिऽवः। यत्। विऽभराः। रोदसी इति। उभे इति। जयन्। अपः। मनवे। दानुऽचित्राः ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 30 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शक्तीवः) बहुत प्रकार की सामर्थ्य से युक्त (मघवन्) श्रेष्ठ ऐश्वर्य्यवाले राजन् ! बुद्धिमान् जन (यत्) जैसे (या) जिन (पूर्वाणि) प्राचीन (करणानि) साधनों और जिन (नूतना) नवीनों को (प्र) सिद्ध करते हैं, उन साधनों का मैं (ते) आपके लिये वैसे (प्र, वोचम्) उपदेश करूँ और जो (विभराः) विशेष करके पोषण करने और (दानुचित्राः) अद्भुत दानवाले विद्वान् जन (मनवे) मनुष्य के लिये (उभे) दोनों (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी को जनाते हैं, उनके साथ आप मनुष्य के लिये (अपः) सूर्य्य जैसे जलों को वैसे शत्रुओं के प्राणों को (जयन्) जीतते हुए उनके सुख के लिये सत्कार को (चकर्थ) करते हैं ॥६॥
Essence
हे राजा आदि जनो ! जो विद्वान् जन आप लोगों के लिये अनादिकाल से सिद्ध राजनीति और विजय के उपायों की शिक्षा करें, उनको अपने आत्मा के सदृश आप लोग सत्कार करें ॥६॥
Subject
अब विद्वानों के गुणों को कहते हैं ॥