Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 5 / Sukta 31 / Mantra 13

87 Sukta
13 Mantra
5/31/13
Devata- इन्द्र: Rishi- अमहीयुः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ये चा॒कन॑न्त चा॒कन॑न्त॒ नू ते मर्ता॑ अमृत॒ मो ते अंह॒ आर॑न्। वा॒व॒न्धि यज्यूँ॑रु॒त तेषु॑ धे॒ह्योजो॒ जने॑षु॒ येषु॑ ते॒ स्याम॑ ॥१३॥

ये । चा॒कन॑न्त । चा॒कन॑न्त । नु । ते । मर्ताः॑ । अ॒मृ॒त॒ । मो इति॑ । ते । अंहः॑ । आ । अ॒र॒न् । व॒व॒न्धि । यज्यू॑न् । उ॒त । तेषु॑ । धे॒हि॒ । ओजः॑ । जने॑षु । येषु॑ । ते॒ । स्याम॑ ॥

Mantra without Swara
ये चाकनन्त चाकनन्त नू ते मर्ता अमृत मो ते अंह आरन्। वावन्धि यज्यूँरुत तेषु धेह्योजो जनेषु येषु ते स्याम ॥

ये। चाकनन्त। चाकनन्त। नु। ते। मर्ताः। अमृत। मो इति। ते। अंहः। आ। अरन्। ववन्धि। यज्यून्। उत। तेषु। धेहि। ओजः। जनेषु। येषु। ते। स्याम ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 31 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अमृत) आत्मस्वरूप से मरणधर्म्मरहित विद्वान् ! (ये) जो विद्या, विनय और सत्य आचरणों की (चाकनन्त) कामना करते हैं तथा अन्यों के लिये भी (चाकनन्त) कामना करते हैं, (ते) वे (मर्त्ताः) मनुष्य सत्य की (नू) शीघ्र कामना करते हैं और (ते) वे (अंहः) अपराध को (मो) नहीं (आ, अरन्) सब प्रकार से प्राप्त हों और वे (उत) ही (यज्यून्) सत्यभाषण आदि यज्ञ के अनुष्ठान करनेवाले जनों को (वावन्धि) बन्धनयुक्त करते हैं तथा (येषु) जिन (जनेषु) सत्य आचरण करनेवाले मनुष्यों में हम लोग (ते) आपके मित्र (स्याम) होवें (तेषु) उन हम लोगों में आप (ओजः) पराक्रम को (धेहि) धारण कीजिये ॥१३॥
Essence
हे विद्वान् जनो ! जो जन विद्या, सत्य आचरण तथा परोपकार की और अधर्म्म आचरण के त्याग की कामना करके सब के उपकार की इच्छा करें, वे धन्यवादयुक्त होवें और हम लोग भी ऐसे होवें, ऐसी इच्छा करें ॥१३॥ इस सूक्त में इन्द्र और शिल्पविद्या के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह इकतीसवाँ सूक्त और इकतीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥