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Rigveda Mandal 5 / Sukta 31 / Mantra 12

87 Sukta
13 Mantra
5/31/12
Devata- इन्द्र: Rishi- अमहीयुः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आयं ज॑ना अभि॒चक्षे॑ जगा॒मेन्द्रः॒ सखा॑यं सु॒तसो॑ममि॒च्छन्। वद॒न्ग्रावाव॒ वेदिं॑ भ्रियाते॒ यस्य॑ जी॒रम॑ध्व॒र्यव॒श्चर॑न्ति ॥१२॥

आ । अ॒यम् । ज॒नाः॒ । अ॒भि॒ऽचक्षे॑ । ज॒गा॒म॒ । इन्द्रः॑ । सखा॑यम् । सु॒तऽसो॑मम् । इ॒च्छन् । वद॑न् । ग्रावा॑ । अव॑ । वेदि॑म् । भ्रि॒या॒ते॒ । यस्य॑ । जी॒रम् । अ॒ध्व॒र्यवः॑ । चर॑न्ति ॥

Mantra without Swara
आयं जना अभिचक्षे जगामेन्द्रः सखायं सुतसोममिच्छन्। वदन्ग्रावाव वेदिं भ्रियाते यस्य जीरमध्वर्यवश्चरन्ति ॥

आ। अयम्। जनाः। अभिऽचक्षे। जगाम। इन्द्रः। सखायम्। सुतऽसोमम्। इच्छन्। वदन्। ग्रावा। अव। वेदिम्। भ्रियाते। यस्य। जीरम्। अध्वर्यवः। चरन्ति ॥१२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 31 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (जनाः) प्रसिद्ध विद्वान् जनो ! जो (अयम्) यह (इन्द्रः) ऐश्वर्य्यवाला (अभिचक्षे) सब ओर से प्रसिद्ध होने को (सुतसोमम्) संपन्न की पदार्थविद्या जिसने ऐसे (सखायम्) मित्र की (इच्छन्) इच्छा करता और (ग्रावा) गर्जना से युक्त मेघ के सदृश (वदन्) उपदेश देता हुआ जन (वेदिम्) अग्नि के स्थान को (अव, आ, जगाम) प्राप्त होवे (यस्य) जिसके (जीरम्) वेग को (अध्वर्यवः) विद्यारूप यज्ञ के सम्पादक अर्थात् उक्त यज्ञ को प्रसिद्ध करनेवाले जन (चरन्ति) प्राप्त होते हैं और जो दो शिल्पविद्या को (भ्रियाते) धारण करें, उन दोनों का सदा ही आप लोग सत्कार करें ॥१२॥
Essence
जो जन विद्या की प्राप्ति तथा विद्या देने के लिये सम्पूर्ण जनों के साथ मित्रता करके मिलें, वे सम्पूर्ण विद्या के प्राप्त होने को समर्थ होवें ॥१२॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥