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Rigveda Mandal 5 / Sukta 30 / Mantra 3

87 Sukta
15 Mantra
5/30/3
Devata- इन्द्र ऋणञ्चयश्च Rishi- बभ्रु रात्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र नु व॒यं सु॒ते या ते॑ कृ॒तानीन्द्र॒ ब्रवा॑म॒ यानि॑ नो॒ जुजो॑षः। वेद॒दवि॑द्वाञ्छृ॒णव॑च्च वि॒द्वान्वह॑ते॒ऽयं म॒घवा॒ सर्व॑सेनः ॥३॥

प्र । नु । व॒यम् । सु॒ते । या । ते॒ । कृ॒तानि॑ । इन्द्र॑ । ब्रवा॑म । यानि॑ । नः॒ । जुजो॑षः । वेद॑त् । अवि॑द्वान् । शृ॒णव॑त् । च॒ । वि॒द्वान् । वह॑ते । अ॒यम् । म॒घऽवा॑ । सर्व॑ऽसेनः ॥

Mantra without Swara
प्र नु वयं सुते या ते कृतानीन्द्र ब्रवाम यानि नो जुजोषः। वेददविद्वाञ्छृणवच्च विद्वान्वहतेऽयं मघवा सर्वसेनः ॥

प्र। नु। वयम्। सुते। या। ते। कृतानि। इन्द्र। ब्रवाम। यानि। नः। जुजोषः। वेदत्। अविद्वान्। शृणवत्। च। विद्वान्। वहते। अयम्। मघऽवा। सर्वऽसेनः ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 26 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) विद्वन् ! (या) जिन (ते) आपके (सुते) उत्पन्न हुए संसार में (कृतानि) किये हुए कार्य्यों का (नः) हम लोगों के (यानि) जिन कार्य्यों को (जुजोषः) आप सेवते हो उनका (वयम्) हम लोग (नु) शीघ्र (प्र, ब्रवाम) उपदेश देवें और जब (अयम्) यह (मघवा) बहुत धनवाला और (सर्वसेनः) सम्पूर्ण सेनाओं से युक्त (विद्वान्) विद्वान् जन विद्या को (वहते) प्राप्त होता वा प्राप्त कराता है, तब यह (अविद्वान्) विद्या से रहित जन (शृणवत्) श्रवण करे और (वेदत्) विशेष करके जाने (च) भी ॥३॥
Essence
दो उपाय विद्या की प्राप्ति के लिए जानने चाहियें, उनमें प्रथम उपाय यह कि विद्या का अध्यापक यथार्थवक्ता होवे तथा सुनने और पढ़नेवाला पवित्र, कपटरहित और पुरुषार्थी होवे। दूसरा उपाय यह है कि श्रेष्ठ विद्वानों का कर्म्म देख कर आप भी वैसा ही कर्म्म करे, ऐसा करने पर सब को विद्या का लाभ होवे ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥