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Rigveda Mandal 5 / Sukta 30 / Mantra 15

87 Sukta
15 Mantra
5/30/15
Devata- इन्द्र ऋणञ्चयश्च Rishi- बभ्रु रात्रेयः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
चतुः॑सहस्रं॒ गव्य॑स्य प॒श्वः प्रत्य॑ग्रभीष्म रु॒शमे॑ष्वग्ने। घ॒र्मश्चि॑त्त॒प्तः प्र॒वृजे॒ य आसी॑दय॒स्मय॒स्तम्वादा॑म॒ विप्राः॑ ॥१५॥

चतुः॑ऽसहस्रम् । गव्य॑स्य । प॒श्वः । प्रति॑ । अ॒ग्र॒भी॒ष्म॒ । रु॒शमे॑षु । अ॒ग्ने॒ । घ॒र्मः । चि॒त् । त॒प्तः । प्र॒ऽवृजे॑ । यः । आसी॑त् । अ॒य॒स्मयः॑ । तम् । ऊँ॒ इति॑ । आदा॑म । विप्राः॑ ॥

Mantra without Swara
चतुःसहस्रं गव्यस्य पश्वः प्रत्यग्रभीष्म रुशमेष्वग्ने। घर्मश्चित्तप्तः प्रवृजे य आसीदयस्मयस्तम्वादाम विप्राः ॥

चतुःऽसहस्रम्। गव्यस्य। पश्वः। प्रति। अग्रभीष्म। रुशमेषु। अग्ने। घर्मः। चित्। तप्तः। प्रऽवृजे। यः। आसीत्। अयस्मयः। तम्। ऊँ इति। आदाम। विप्राः ॥१५॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 28 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
(अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान राजन् ! (यः) जो (अयस्मयः) सुवर्ण के सदृश तेजःस्वरूप (तप्तः) तापयुक्त (घर्मः) प्रताप (प्रवृजे) अच्छे प्रकार त्याग करते हैं जिसमें उसमें और (रुशमेषु) हिंसक मन्त्रियों में (आसीत्) वर्त्तमान है (तम्) उस (चतुःसहस्रम्) चार हजार संख्या युक्त को (गव्यस्य) किरणों के विकार और (पश्वः) पशु के सम्बन्ध में जैसे हम लोग (प्रति, अग्रभीष्म) ग्रहण करें, वैसे आप ग्रहण करो और हे (विप्राः) बुद्धिमान् जनो ! आप लोगों के लिये उस (उ) ही को हम लोग (आदाम) सब प्रकार से देवें, उसको हम लोगों के लिये आप लोग (चित्) भी दीजिये ॥१५॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । जो मनुष्य शीत और उष्ण का सेवन युक्ति से करने को जानते हैं और इसकी विद्या को परस्पर देते हैं, वे सर्वदा रोगरहित होते हैं ॥१५॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तीसवाँ सूक्त और अठ्ठाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥