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Rigveda Mandal 5 / Sukta 30 / Mantra 14

87 Sukta
15 Mantra
5/30/14
Devata- इन्द्र ऋणञ्चयश्च Rishi- बभ्रु रात्रेयः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
औच्छ॒त्सा रात्री॒ परि॑तक्म्या॒ याँ ऋ॑णंच॒ये राज॑नि रु॒शमा॑नाम्। अत्यो॒ न वा॒जी र॒घुर॒ज्यमा॑नो ब॒भ्रुश्च॒त्वार्य॑सनत्स॒हस्रा॑ ॥१४॥

औच्छ॑त् । सा । रात्री॑ । परि॑ऽतक्म्या । या । ऋ॒ण॒म्ऽच॒ये । राज॑नि । रु॒शमा॑नाम् । अत्यः॑ । न । वा॒जी । र॒घुः । अ॒ज्यमा॑नः । ब॒भ्रुः । च॒त्वारि॑ । अ॒स॒न॒त् । स॒हस्रा॑ ॥

Mantra without Swara
औच्छत्सा रात्री परितक्म्या याँ ऋणंचये राजनि रुशमानाम्। अत्यो न वाजी रघुरज्यमानो बभ्रुश्चत्वार्यसनत्सहस्रा ॥

औच्छत्। साः। रात्री। परिऽतक्म्या। या। ऋणम्ऽचये। राजनि। रुशमानाम्। अत्यः। न। वाजी। रघुः। अज्यमानाः। बभ्रुः। चत्वारि। असनत्। सहस्रा ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 28 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! (या) जो (रुशमानाम्) हिंसा करनेवाले मन्त्रियों के (ऋणञ्चये) ऋण को इकट्ठा करता है, जिससे उस (राजनि) राजा में (रघुः) छोटा (अज्यमानः) चलाया गया (बभ्रुः) धारण वा पोषण करनेवाले और (अत्यः) मार्ग को व्याप्त होनेवाले (वाजी) वेगयुक्त के (न) सदृश (चत्वारि) चार (सहस्रा) सहस्रों का (असनत्) विभाग करता है (सा) वह (परितक्म्या) आनन्द देनेवाली (रात्री) रात्री सम्पूर्णों को (औच्छत्) निवास देती है, यह जानो ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे विद्वानो ! आप लोग रात्रि और दिन के कृत्यों को जान कर और स्वयं करके, उत्तम परीक्षा करके राजा आदिकों के लिये उन कृत्यों का उपदेश दीजिये, जिससे ये सब सुखी हों और जैसे शीघ्र चलनेवाला घोड़ा दौड़ता है, वैसे ही दिन और रात्रि व्यतीत होता है, यह जानना चाहिये ॥१४॥
Subject
अब विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

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