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Rigveda Mandal 5 / Sukta 3 / Mantra 12

87 Sukta
12 Mantra
5/3/12
Devata- अग्निः Rishi- वसुश्रुत आत्रेयः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मे यामा॑सस्त्व॒द्रिग॑भूव॒न्वस॑वे वा॒ तदिदागो॑ अवाचि। नाहा॒यम॒ग्निर॒भिश॑स्तये नो॒ न रीष॑ते वावृधा॒नः परा॑ दात् ॥१२॥

इ॒मे । यामा॑सः । त्व॒द्रिक् । अ॒भू॒व॒न् । वस॑वे । वा॒ । तत् । इत् । आगः॑ । अ॒वा॒चि॒ । न । अह॑ । अ॒यम् । अ॒ग्निः । अ॒भिऽश॑स्तये । नः॒ । न । रिष॑ते । व॒वृ॒धा॒नः । परा॑ । दा॒त् ॥

Mantra without Swara
इमे यामासस्त्वद्रिगभूवन्वसवे वा तदिदागो अवाचि। नाहायमग्निरभिशस्तये नो न रीषते वावृधानः परा दात् ॥

इमे। यामासः। त्वद्रिक्। अभूवन्। वसवे। वा। तत्। इत्। आगः। अवाचि। न। अह। अयम्। अग्निः। अभिऽशस्तये। नः। न। रिषते। ववृधानः। परा। दात् ॥१२॥

Ashtak » 3 Adhyay » 8 Varga » 17 Mantra » 6

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Meaning
हे श्रेष्ठ सन्तान जो (अयम्) यह (अग्निः) अग्नि के सदृश वर्त्तमान (नः) हम लोगों को (अभिशस्तये) सब प्रकार के हिंसा करने के लिये (न) नहीं (अह) निश्चय (परा, दात्) दूर पहुँचावे और (वावृधानः) निरन्तर बढ़ता हुआ (न) नहीं (रीषते) हिंसा करता और (त्वद्रिक्) आपके प्रति यत्न कराता (वसवे) धन के लिए (अवाचि) कहा गया (वा) वा (तत्) वह (आगः) अपराध (इत्) ही कहा गया उसको (इमे) जो (यामासः) यम और नियमों से युक्त जन पढ़ाने और उपदेश से पवित्र करें, वे आनन्दित (अभूवन्) होते हैं ॥१२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जो विद्वान् जन किसी को भी बिना अपराध के नहीं दोष देते हैं, उनको अपने समीप से दूर मत निकालो ॥१२॥ इस सूक्त में राजा और प्रजा को चोरी और अन्य अपराध आदि के निवारण आदि के कहने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तीसरा सूक्त और सत्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर प्रजाधर्मविषय को कहते हैं ॥

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