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Rigveda Mandal 5 / Sukta 29 / Mantra 8

87 Sukta
15 Mantra
5/29/8
Devata- इन्द्र: Rishi- गौरिवीतिः शाक्त्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्री यच्छ॒ता म॑हि॒षाणा॒मघो॒ मास्त्री सरां॑सि म॒घवा॑ सो॒म्यापाः॑। का॒रं न विश्वे॑ अह्वन्त दे॒वा भर॒मिन्द्रा॑य॒ यदहिं॑ ज॒घान॑ ॥८॥

त्री । यत् । श॒ता । म॒हि॒षाणा॑म् । अघः॑ । माः । त्री । सरां॑सि । म॒घऽवा॑ । सो॒म्या । अपाः॑ । का॒रम् । न । विश्वे॑ । अ॒ह्व॒न्त॒ । दे॒वाः । भर॑म् । इन्द्रा॑य । यत् । अहि॑म् । ज॒घान॑ ॥

Mantra without Swara
त्री यच्छता महिषाणामघो मास्त्री सरांसि मघवा सोम्यापाः। कारं न विश्वे अह्वन्त देवा भरमिन्द्राय यदहिं जघान ॥

त्री। यत्। शता। महिषाणाम्। अघः। माः। त्री। सरांसि। मघऽवा। सोम्या। अपाः। कारम्। न। विश्वे। अह्वन्त। देवाः। भरम्। इन्द्राय। यत्। अहिम्। जघान ॥८॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 24 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन् ! (यत्) जो आप (अघः) नहीं मारने योग्य होते हुए (महिषाणाम्) बड़े पदार्थों के (त्री) तीन (शता) सैकड़ों को (माः) रचिये और हे (सोम्या) चन्द्रमा के गुणों से सम्पन्न ! (मघवा) बहुत धनवान् होते हुए (त्री) तीन (सरांसि) मेघमण्डल, भूमि और अन्तरिक्ष में स्थित पदार्थों को सूर्य के सदृश प्रजाओं का (अपाः) पालन कीजिये और सूर्य्य (यत्) जैसे (अहिम्) मेघ का (जघान) नाश करता है और जैसे (विश्वे) सम्पूर्ण (देवाः) सम्पूर्ण (देवाः) विद्वान् जन (इन्द्राय) ऐश्वर्य्य के लिये (कारम्) कर्त्ता के (न) सदृश (भरम्) पालन को (अह्वन्त) कहते हैं, वैसे ऐश्वर्य्य के लिये प्रयत्न कीजिये ॥८॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पुरुषार्थी जन को सब स्वीकार करते हैं, वैसे ही सूर्य ईश्वरीय नियमों से नियत जलरस का ग्रहण करता है, जैसे जन बड़े पदार्थों की उत्तेजना से सैकड़ों काम सिद्ध करते हैं, वैसे ही राजा प्रजाजनों से बड़े राजकार्य्य को सिद्ध करे ॥८॥
Subject
फिर राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥