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Rigveda Mandal 5 / Sukta 29 / Mantra 14

87 Sukta
15 Mantra
5/29/14
Devata- इन्द्र: Rishi- गौरिवीतिः शाक्त्यः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒ता विश्वा॑ चकृ॒वाँ इ॑न्द्र॒ भूर्यप॑रीतो ज॒नुषा॑ वी॒र्ये॑ण। या चि॒न्नु व॑ज्रिन्कृ॒णवो॑ दधृ॒ष्वान्न ते॑ व॒र्ता तवि॑ष्या अस्ति॒ तस्याः॑ ॥१४॥

ए॒ता । विश्वा॑ । च॒कृ॒ऽवान् । इ॒न्द्र॒ । भूरि॑ । अप॑रिऽइतः । ज॒नुषा॑ । वी॒र्ये॑ण । या । चि॒त् । नु । व॒ज्रि॒न् । कृ॒णवः॑ । द॒धृ॒ष्वान् । न । ते॒ । व॒र्ता । तवि॑ष्याः । अ॒स्ति॒ । तस्याः॑ ॥

Mantra without Swara
एता विश्वा चकृवाँ इन्द्र भूर्यपरीतो जनुषा वीर्येण। या चिन्नु वज्रिन्कृणवो दधृष्वान्न ते वर्ता तविष्या अस्ति तस्याः ॥

एता। विश्वा। चकृऽवान्। इन्द्र। भूरि। अपरिऽइतः। जनुषा। वीर्येण। या। चित्। नु। वज्रिन्। कृणवः। दधृष्वान्। न। ते। वर्ता। तविष्याः। अस्ति। तस्याः ॥१४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 4

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Meaning
हे (वज्रिन्) उत्तम शस्त्र और अस्त्रों से और (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त राजन् ! (अपरीतः) नहीं वर्ज्जित आप (जनुषा) दूसरे जन्म से और (वीर्य्येण) पराक्रम से (चित्) भी (एता) इन (विश्वा) सब को (चकृवान्) किये हुए हो और (या) जिन (भूरि) बहुत बलों को (कृणवः) करिये। हे राजन् ! (ते) आपकी निश्चित (तस्याः) उस (तविष्याः) बलयुक्त सेना का (दधृष्वान्) धृष्ट अर्थात् हर्षित किया हुआ (नु) शीघ्र (वर्त्ता) स्वीकार करनेवाला कोई भी (न) नहीं (अस्ति) है ॥१४॥
Essence
जो राजा आदि जन हैं, वे ब्रह्मचर्य्य से विद्याओं को प्राप्त होकर चवालीस वर्ष की अवस्था से युक्त हुए समावर्त्तन करके अर्थात् गृहस्थाश्रम को विधिपूर्वक ग्रहण कर स्वयंवर विवाह कर और सेना की वृद्धि करके प्रजा की सब प्रकार से रक्षा करें ॥१४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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