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Rigveda Mandal 5 / Sukta 29 / Mantra 13

87 Sukta
15 Mantra
5/29/13
Devata- इन्द्र: Rishi- गौरिवीतिः शाक्त्यः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क॒थो नु ते॒ परि॑ चराणि वि॒द्वान्वी॒र्या॑ मघव॒न्या च॒कर्थ॑। या चो॒ नु नव्या॑ कृ॒णवः॑ शविष्ठ॒ प्रेदु॒ ता ते॑ वि॒दथे॑षु ब्रवाम ॥१३॥

क॒थो इति॑ । नु । ते॒ । परि॑ । च॒रा॒णि॒ । वि॒द्वान् । वी॒र्या॑ । म॒घ॒ऽव॒न् । या । च॒कर्थ॑ । या । चो॒ इति॑ । नु । नव्या॑ । कृ॒णवः॑ । श॒वि॒ष्ठ॒ । प्र । इत् । ऊँ॒ इति॑ । ता । ते॒ । वि॒दथे॑षु । ब्र॒वा॒म॒ ॥

Mantra without Swara
कथो नु ते परि चराणि विद्वान्वीर्या मघवन्या चकर्थ। या चो नु नव्या कृणवः शविष्ठ प्रेदु ता ते विदथेषु ब्रवाम ॥

कथो इति। नु। ते। परि। चराणि। विद्वान्। वीर्या। मघऽवन्। या। चकर्थ। या। चो इति। नु। नव्या। कृणवः। शविष्ठ। प्र। इत्। ऊँ इति। ता। ते। विदथेषु। ब्रवाम ॥१३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 25 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघवन्) श्रेष्ठ धन से युक्त ! (या) जो (ते) आपकी (परि) सब ओर से (चराणि) चलनेवाली और प्राप्त होने योग्य (वीर्या) पराक्रमयुक्त सेनाओं को (कथो) किस प्रकार (नु) निश्चय से (चकर्थ) करते हो तथा (विद्वान्) विद्वान् आप (या) जिनको (चो) और (नव्या) नवीनों में उत्पन्नों को (नु) निश्चय से (कृणवः) सिद्ध करते हो। हे (शविष्ठ) अतिशय करके बलिष्ठ ! (ते) आपके जिनको (विदथेषु) सङ्ग्रामों में हम लोग (प्र, ब्रवाम) उपदेश करें (ता) उनको (इत्) निश्चय से (उ) भी आप ग्रहण करो ॥१३॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि सदा ही नवीन-नवीन विद्या और नवीन-नवीन कार्य्य को सिद्ध करके ऐश्वर्य्य को प्राप्त होवें, इसी प्रकार अन्यों के प्रति उपदेश करें ॥१३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥