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Rigveda Mandal 5 / Sukta 29 / Mantra 1

87 Sukta
15 Mantra
5/29/1
Devata- अग्निः Rishi- विश्वावारात्रेयी Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
त्र्य॑र्य॒मा मनु॑षो दे॒वता॑ता॒ त्री रो॑च॒ना दि॒व्या धा॑रयन्त। अर्च॑न्ति त्वा म॒रुतः॑ पू॒तद॑क्षा॒स्त्वमे॑षा॒मृषि॑रिन्द्रासि॒ धीरः॑ ॥१॥

त्री । अ॒र्य॒मा । मनु॑षः । दे॒वऽता॑ता । त्री । रो॒च॒ना । दि॒व्या । धा॒र॒य॒न्त॒ । अर्च॑न्ति । त्वा॒ । म॒रुतः॑ । पू॒तऽद॑क्षाः । त्वम् । ए॒षा॒म् । ऋषिः॑ । इ॒न्द्र॒ । अ॒सि॒ । धीरः॑ ॥

Mantra without Swara
त्र्यर्यमा मनुषो देवताता त्री रोचना दिव्या धारयन्त। अर्चन्ति त्वा मरुतः पूतदक्षास्त्वमेषामृषिरिन्द्रासि धीरः ॥

त्री। अर्यमा। मनुषः। देवऽताता। त्री। रोचना। दिव्या। धारयन्त। अर्चन्ति। त्वा। मरुतः। पूतऽदक्षाः। त्वम्। एषाम्। ऋषिः। इन्द्र। असि। धीरः ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 23 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य से युक्त करनेवाले राजन् ! जो (मनुषः) मनुष्य (देवताता) विद्वानों से करने योग्य व्यवहार में (दिव्या) श्रेष्ठ (त्री) तीन (रोचना) प्रकाशकों को (धारयन्त) धारण करते हैं (अर्यमा) व्यवस्थापक अर्थात् किसी कार्य्य को रीति से संयुक्त करनेवाला (त्री) तीन सुखों को धारण करता है और जो (पूतदक्षाः) पवित्र बल से संयुक्त करनेवाला (त्री) तीन सुखों को धारण करता है और जो (पूतदक्षाः) पवित्र बलवाले (मरुतः) मनुष्य (त्वा) आपका (अर्चन्ति) सत्कार करते हैं (एषाम्) इनके (त्वम्) आप (ऋषिः) मन्त्र और अर्थों के जाननेवाले (धीरः) धीर (असि) हो ॥१॥
Essence
जो तीन कर्म्म, उपासना और ज्ञान को धारण करके पवित्र होते हैं, वे ही बलवान् होकर सत्कृत होते हैं ॥१॥
Subject
अब पन्द्रह ऋचावाले उनतीसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में इन्द्रपदवाच्य राजगुणों को कहते हैं ॥