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Rigveda Mandal 5 / Sukta 28 / Mantra 6

87 Sukta
6 Mantra
5/28/6
Devata- अग्निः Rishi- विश्वावारात्रेयी Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ जु॑होता दुव॒स्यता॒ग्निं प्र॑य॒त्य॑ध्व॒रे। वृ॒णी॒ध्वं ह॑व्य॒वाह॑नम् ॥६॥

आ । जु॒हो॒त॒ । दु॒व॒स्यत । अ॒ग्निम् । प्र॒ऽय॒ति । अ॒ध्व॒रे । वृ॒णी॒ध्वम् । ह॒व्य॒ऽवाह॑नम् ॥

Mantra without Swara
आ जुहोता दुवस्यताग्निं प्रयत्यध्वरे। वृणीध्वं हव्यवाहनम् ॥

आ। जुहोत। दुवस्यत। अग्निम्। प्रऽयति। अध्वरे। वृणीध्वम्। हव्यऽवाहनम् ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 22 Mantra » 6

Bhashya

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Meaning
हे विद्वानो ! आप लोग (प्रयति) प्रयत्न से साध्य (अध्वरे) शिल्पादि व्यवहार में (हव्यवाहनम्) उत्तम पदार्थों को प्राप्त करानेवाले (अग्निम्) अग्नि का (दुवस्यत) परिचरण करो अर्थात् युक्ति से उसको कार्य्य में लगाओ और (वृणीध्वम्) स्वीकार करो तथा अन्य जनों के लिये (आ, जुहोता) आदान करो अर्थात ग्रहण करो ॥६॥
Essence
विद्यार्थिजन, जैसे विद्वान् जन शिल्पविद्या को स्वीकार करते हैं, वैसे ही स्वयं भी स्वीकार करें ॥६॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह अठ्ठाईसवाँ सूक्त और बाईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर विद्वद्विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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