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Rigveda Mandal 5 / Sukta 28 / Mantra 4

87 Sukta
6 Mantra
5/28/4
Devata- अग्निः Rishi- विश्वावारात्रेयी Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
समि॑द्धस्य॒ प्रम॑ह॒सोऽग्ने॒ वन्दे॒ तव॒ श्रिय॑म्। वृ॒ष॒भो द्यु॒म्नवाँ॑ असि॒ सम॑ध्व॒रेष्वि॑ध्यसे ॥४॥

सम्ऽइ॑द्धस्य । प्रऽम॑हसः । अ॒ग्ने॒ । वन्दे॑ । तव॑ । श्रिय॑म् । वृ॒ष॒भः । द्यु॒म्नऽवा॑न् । अ॒सि॒ । सम् । अ॒ध्व॒रेषु॑ । इ॒ध्य॒से॒ ॥

Mantra without Swara
समिद्धस्य प्रमहसोऽग्ने वन्दे तव श्रियम्। वृषभो द्युम्नवाँ असि समध्वरेष्विध्यसे ॥

सम्ऽइद्धस्य। प्रऽमहसः। अग्ने। वन्दे। तव। श्रियम्। वृषभः। द्युम्नऽवान्। असि। सम्। अध्वरेषु। इध्यसे ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 22 Mantra » 4

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Meaning
हे (अग्ने) राजन् ! जो तुम (वृषभः) बलिष्ठ वा उत्तम और (द्युम्नवान्) यशस्वी (असि) हो और (अध्वरेषु) राज्य के पालन आदि व्यवहारों में (सम्, इध्यसे) प्रकाशित किये जाते हो उन (समिद्धस्य) प्रकाशमान और (प्रमहसः) और प्रकृष्ट बड़े (तव) आपके (श्रियम्) धन की मैं (वन्दे) प्रशंसा वा सत्कार करता हँ ॥४॥
Essence
जो राजा अग्नि आदि के गुणों से युक्त हुआ अच्छे न्याय को यथावत् करता है, वह यज्ञों में अग्नि के सदृश सर्वत्र प्रकट यशवाला होता है ॥४॥
Subject
अब विद्वद्विषय में राज्यप्रकार को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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