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Rigveda Mandal 5 / Sukta 27 / Mantra 4

87 Sukta
6 Mantra
5/27/4
Devata- अग्निः Rishi- त्र्यरुणस्त्रैवृष्णस्त्रसदस्युश्च पौरुकुत्स अश्वमेधश्च भारतोऽविर्वा Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो म॒ इति॑ प्र॒वोच॒त्यश्व॑मेधाय सू॒रये॑। दद॑दृ॒चा स॒निं य॒ते दद॑न्मे॒धामृ॑ताय॒ते ॥४॥

यः । मे॒ । इति॑ । प्र॒ऽवोच॑ति । अश्व॑ऽमेधाय । सू॒रये॑ । दद॑त् । ऋ॒चा । स॒निम् । य॒ते । दद॑त् । मे॒धाम् । ऋ॒त॒ऽय॒ते ॥

Mantra without Swara
यो म इति प्रवोचत्यश्वमेधाय सूरये। दददृचा सनिं यते ददन्मेधामृतायते ॥

यः। मे। इति। प्रऽवोचति। अश्वऽमेधाय। सूरये। ददत्। ऋचा। सनिम्। यते। ददत्। मेधाम्। ऋतऽयते ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 4

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Meaning
(यः) जो (अश्वमेधाय) शीघ्र पवित्र (सूरये) विद्वान् (मे) मेरे लिये (ऋचा) ऋग्वेदादि से (सनिम्) सेवन करने योग्य तथा सत्य और असत्य की विभाग करनेवाली वाणी को (ददत्) देवे और (ऋतायते) सत्य की कामना करते हुए (यते) यत्न करनेवाले मेरे लिये (मेधाम्) बुद्धि को (ददत्) देवे, उसका सत्कार आप करो (इति) इस प्रकार से मेरे प्रति जो (प्रवोचति) उपदेश देता है, उसका उपकार मैं मानता हूँ ॥४॥
Essence
उपदेशक जन जब अन्य जनों के प्रति उपदेश देवें, तब इस प्रकार वेद और शास्त्रों में कहे और यथार्थवक्ताओं से आचरण किये गये इस विषय का हम आप लोगों के लिये उपदेश देवें, इस प्रकार प्रत्युपदेश कहें ॥४॥
Subject
अब उपदेशविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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