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Rigveda Mandal 5 / Sukta 27 / Mantra 3

87 Sukta
6 Mantra
5/27/3
Devata- अग्निः Rishi- त्र्यरुणस्त्रैवृष्णस्त्रसदस्युश्च पौरुकुत्स अश्वमेधश्च भारतोऽविर्वा Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ए॒वा ते॑ अग्ने सुम॒तिं च॑का॒नो नवि॑ष्ठाय नव॒मं त्र॒सद॑स्युः। यो मे॒ गिर॑स्तुविजा॒तस्य॑ पू॒र्वीर्यु॒क्तेना॒भि त्र्य॑रुणो गृ॒णाति॑ ॥३॥

ए॒व । ते॒ । अ॒ग्ने॒ । सु॒ऽम॒तिम् । च॒का॒नः । नवि॑ष्ठाय । न॒व॒मम् । त्र॒सद॑स्युः । यः । मे॒ । गिरः॑ । तु॒वि॒जा॒तस्य॑ । पू॒र्वीः । यु॒क्तेन॑ । अ॒भि । त्रिऽअ॑रुणः । गृ॒णाति॑ ॥

Mantra without Swara
एवा ते अग्ने सुमतिं चकानो नविष्ठाय नवमं त्रसदस्युः। यो मे गिरस्तुविजातस्य पूर्वीर्युक्तेनाभि त्र्यरुणो गृणाति ॥

एव। ते। अग्ने। सुऽमतिम्। चकानः। नविष्ठाय। नवमम्। त्रसदस्युः। यः। मे। गिरः। तुविऽजातस्य। पूर्वीः। युक्तेन। अभि। त्रिऽअरुणः। गृणाति ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 3

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश तेजस्वी विद्वान् ! (यः) जो (ते) आपकी (सुमतिम्) सुन्दर बुद्धि को और (तुविजातस्य) बहुतों में प्रकट हुए (मे) मेरी (गिरः) वाणियों की (चकानः) कामना करता तथा (नविष्ठाय) अतिशय नवीन जन के लिये (नवमम्) नव के पूर्ण करनेवाले की कामना करता हुआ (त्रसदस्युः) त्रसदस्यु अर्थात् जिससे चोर डरते ऐसा (युक्तेन) किया योगाभ्यास जिससे ऐसे मन से (त्र्यरुणः) तीन मन, शरीर और आत्मा के सुखों को प्राप्त होता हुआ जन (पूर्वीः) अनादि काल से सिद्ध वाणियों को (अभि, गृणाति) सब ओर से कहता है (एवा) उसी का आप और हम निरन्तर सत्कार करें ॥३॥
Essence
हे विद्वन् ! आप और मैं जो हमारे समीप से गुणों के ग्रहण करने की इच्छा करता है, उसको हम दोनों विद्याग्रहण करावें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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