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Rigveda Mandal 5 / Sukta 27 / Mantra 2

87 Sukta
6 Mantra
5/27/2
Devata- अग्निः Rishi- वसुयव आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यो मे॑ श॒ता च॑ विंश॒तिं च॒ गोनां॒ हरी॑ च यु॒क्ता सु॒धुरा॒ ददा॑ति। वैश्वा॑नर॒ सुष्टु॑तो वावृधा॒नोऽग्ने॒ यच्छ॒ त्र्य॑रुणाय॒ शर्म॑ ॥२॥

यः । मे॒ । श॒ता । च॒ । विं॒श॒तिम् । च॒ । गोना॑म् । हरी॒ इति॑ । च॒ । यु॒क्ता । सु॒ऽधुरा॑ । ददा॑ति । वैश्वा॑नर । सुऽस्तु॑तः । व॒वृ॒धा॒नः । अग्ने॑ । यच्छ॑ । त्रिऽअ॑रुणाय । शर्म॑ ॥

Mantra without Swara
यो मे शता च विंशतिं च गोनां हरी च युक्ता सुधुरा ददाति। वैश्वानर सुष्टुतो वावृधानोऽग्ने यच्छ त्र्यरुणाय शर्म ॥

यः। मे। शता। च। विंशतिम्। च। गोनाम्। हरी इति। च। युक्ता। सुऽधुरा। ददाति। वैश्वानर। सुऽस्तुतः। ववृधानः। अग्ने। यच्छ। त्रिऽअरुणाय। शर्म ॥२॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वैश्वानर) सब में प्रकाशमान (अग्ने) विद्वन् (यः) जो (सुष्टुतः) उत्तम प्रकार प्रशंसा किया गया (वावृधानः) अत्यन्त बढ़ता अर्थात् वृद्धि को प्राप्त होता हुआ (मे) मेरे (गोनाम्) गौओं के (शता) सैकड़ौं (च) और (विंशतिम्) बीसों संख्यावाले समूह को (च) और (युक्ता) युक्त (सुधुरा) उत्तम धुरा जिनमें उन (हरी) ले चलनेवाले घोड़ों को (च) भी (ददाति) देता है उस (त्र्यरुणाय) तीन गुणोंवाले पुरुष के लिये आप (शर्म्म) गृह वा सुख को (यच्छ) दीजिये ॥२॥
Essence
हे मनुष्यो ! जो गौ, घोड़ा और हस्ति आदि पशुओं के पालन करनेवाले होवें, उनके लिये यथायोग्य मासिक वृत्ति दीजिये ॥२॥
Subject
फिर विद्वान् के गुणों को कहते हैं ॥