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Rigveda Mandal 5 / Sukta 26 / Mantra 9

87 Sukta
9 Mantra
5/26/9
Devata- अग्निः Rishi- वसुयव आत्रेयः Chhanda- विराड्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
एदं म॒रुतो॑ अ॒श्विना॑ मि॒त्रः सी॑दन्तु॒ वरु॑णः। दे॒वासः॒ सर्व॑या वि॒शा ॥९॥

आ । इ॒दम् । म॒रुतः॑ । अ॒श्विना॑ । मि॒त्रः । सी॒द॒न्तु॒ । वरु॑णः । दे॒वासः॑ । सर्व॑या । वि॒शा ॥

Mantra without Swara
एदं मरुतो अश्विना मित्रः सीदन्तु वरुणः। देवासः सर्वया विशा ॥

आ। इदम्। मरुतः। अश्विना। मित्रः। सीदन्तु। वरुणः। देवासः। सर्वया। विशा ॥९॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 20 Mantra » 4

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Meaning
(मरुतः) मनुष्य (मित्रः) मित्र (वरुण) सब में उत्तम (अश्विना) अध्यापक और उपदेशक तथा (देवासः) विद्वान् जन (सर्वया) सम्पूर्ण (विशा) प्रजा से (इदम्) इस आसन पर (आ, सीदन्तु) विराजें ॥९॥
Essence
राजा और श्रेष्ठ जन न्यायासन पर विराज के अन्याय और पक्षपात का त्याग और न्याय करके प्रजाओं के प्रिय होवें ॥९॥ इस सूक्त में अग्नि और विद्वान् के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह छब्बीसवाँ सूक्त और बीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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