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Rigveda Mandal 5 / Sukta 26 / Mantra 7

87 Sukta
9 Mantra
5/26/7
Devata- अग्निः Rishi- वसुयव आत्रेयः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
न्य१॒॑ग्निं जा॒तवे॑दसं होत्र॒वाहं॒ यवि॑ष्ठ्यम्। दधा॑ता दे॒वमृ॒त्विज॑म् ॥७॥

नि । अ॒ग्निम् । जा॒तऽवे॑दसम् । हो॒त्र॒ऽवाहम् । यवि॑ष्ठ्यम् । दधा॑त । दे॒वम् । ऋ॒त्विज॑म् ॥

Mantra without Swara
न्य१ग्निं जातवेदसं होत्रवाहं यविष्ठ्यम्। दधाता देवमृत्विजम् ॥

नि। अग्निम्। जातऽवेदसम्। होत्रऽवाहम्। यविष्ठ्यम्। दधात। देवम्। ऋत्विजम् ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 20 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! आप लोग (यविष्ठ्यम्) अतिशयित युवा जनों में प्रसिद्ध हुए (ऋत्विजम्) यज्ञसाधक और (देवम्) दिव्य गुणवाले के सदृश (जातवेदसम्) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (होत्रवाहम्) हवन की हुई वस्तुओं को धारण करनेवाले (अग्निम्) अग्नि को (नि, दधाता) निरन्तर धारण करो ॥७॥
Essence
जैसे शिल्पविद्या के जाननेवाले जन अपने कार्य्य को सिद्ध करते हैं, वैसे ही अग्नि आदि भी कार्य की सिद्धि करते हैं ॥७॥
Subject
अब अग्निधारणविषय को कहते हैं ॥