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Rigveda Mandal 5 / Sukta 26 / Mantra 6

87 Sukta
9 Mantra
5/26/6
Devata- अग्निः Rishi- वसुयव आत्रेयः Chhanda- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स॒मि॒धा॒नः स॑हस्रजि॒दग्ने॒ धर्मा॑णि पुष्यसि। दे॒वानां॑ दू॒त उ॒क्थ्यः॑ ॥६॥

स॒म्ऽइ॒ध॒नः । स॒ह॒स्र॒ऽजि॒त् । अग्ने॑ । धर्मा॑णि । पु॒ष्य॒सि॒ । दे॒वाना॑म् । दू॒तः । उ॒क्थ्यः॑ ॥

Mantra without Swara
समिधानः सहस्रजिदग्ने धर्माणि पुष्यसि। देवानां दूत उक्थ्यः ॥

सम्ऽइधानः। सहस्रऽजित्। अग्ने। धर्माणि। पुष्यसि। देवानाम्। दूतः। उक्थ्यः ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 20 Mantra » 1

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के सदृश दुष्टों के जलानेवाले ! जैसे (समिधानः) निरन्तर प्रकाशित हुआ अग्नि (देवानाम्) विद्वानों के (दूतः) समाचार को दूर व्यवहरता वा दूर पहुँचाता और ले आता है, वैसे (सहस्रजित्) असङ्ख्यों के जीतनेवाले (उक्थ्यः) प्रशंसा करने योग्य विद्वानों का निरन्तर प्रकाश करने, समाचार को दूर व्यवहरने वा दूर पहुँचाने और लानेवाले होते हुए जिससे (धर्म्माणि) धर्म्मसम्बन्धी कर्म्मों को (पुष्यसि) पुष्ट करते हो, इससे सत्कार करने योग्य हो ॥६॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्य विद्या से अग्नि के गुणों को जान के कार्य्य की सिद्धि के लिये जिस अग्नि का सम्प्रयोग करते हैं, वह अग्नि मनुष्य के तुल्य कार्य्य की सिद्धि को करता है ॥६॥
Subject
फिर अग्निसादृश्य से विद्वद्विषय को कहते हैं ॥

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