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Rigveda Mandal 5 / Sukta 26 / Mantra 3

87 Sukta
9 Mantra
5/26/3
Devata- अग्निः Rishi- वसुयव आत्रेयः Chhanda- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वी॒तिहो॑त्रं त्वा कवे द्यु॒मन्तं॒ समि॑धीमहि। अग्ने॑ बृ॒हन्त॑मध्व॒रे ॥३॥

वी॒तिऽहो॑त्रम् । त्वा॒ । क॒वे॒ । द्यु॒ऽमन्त॑म् । सम् । इ॒धी॒म॒हि॒ । अग्ने॑ । बृ॒हन्त॑म् । अ॒ध्व॒रे ॥

Mantra without Swara
वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्तं समिधीमहि। अग्ने बृहन्तमध्वरे ॥

वीतिऽहोत्रम्। त्वा। कवे। द्युऽमन्तम्। सम्। इधीमहि। अग्ने। बृहन्तम्। अध्वरे ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 19 Mantra » 3

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Meaning
हे (कवे) विद्वन् (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! हम लोग (अध्वरे) अहिंसारूप यज्ञ में (वीतिहोत्रम्) व्याप्ति का ग्रहण जिससे उस (द्युमन्तम्) प्रकाशवाले अग्नि के सदृश जिन (बृहन्तम्) महान् (त्वा) आपको (सम्, इधीमहि) उत्तम प्रकार प्रकाशित करें, वह आप हम लागों को शुद्ध विद्या से प्रकाशित करें ॥३॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि शिल्पविद्या की सिद्धि के लिये अग्नि का सम्प्रयोग अवश्य करें ॥३॥
Subject
फिर अग्नि के सादृश्य से विद्वान् के गुणों को कहते हैं ॥

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