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Rigveda Mandal 5 / Sukta 25 / Mantra 7

87 Sukta
9 Mantra
5/25/7
Devata- अग्निः Rishi- वसुयव आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
यद्वाहि॑ष्ठं॒ तद॒ग्नये॑ बृ॒हद॑र्च विभावसो। महि॑षीव॒ त्वद्र॒यिस्त्वद्वाजा॒ उदी॑रते ॥७॥

यत् । वाहि॑ष्ठम् । तत् । अ॒ग्नये॑ । बृ॒हत् । अ॒र्च॒ । वि॒भा॒व॒सो॒ इति॑ विभाऽवसो । महि॑षीऽइव । त्वत् । र॒यिः । त्वत् । वाजाः॑ । उत् । ई॒रते ॥

Mantra without Swara
यद्वाहिष्ठं तदग्नये बृहदर्च विभावसो। महिषीव त्वद्रयिस्त्वद्वाजा उदीरते ॥

यत्। वाहिष्ठम्। तत्। अग्नये। बृहत्। अर्च। विभावसो इति विभाऽवसो। महिषीऽइव। त्वत्। रयिः। त्वत्। वाजाः। उत्। ईरते ॥७॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 18 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (विभावसो) स्वयं प्रकाशित ! (यत्) जिस (वाहिष्ठम्) अतिशय प्राप्त करनेवाले का (अग्नये) राजा के लिये (बृहत्) बड़ा (अर्च) सत्कार करो (तत्) उसकी (महिषीव) बड़ी अर्थात् पटरानी के सदृश सेवा करो और जो (त्वत्) आपसे (रयिः) धन और (त्वत्) आपसे (वाजाः) अन्न आदि (उत्, ईरते) उत्तमता से उत्पन्न होते हैं, उनको हम लोग प्राप्त होवें ॥७॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे पतिव्रता रानी अपने पति का निरन्तर सत्कार करती और उससे उत्पन्न हुए अत्यन्त सुख को प्राप्त होती है, वैसे ही मनुष्य विद्वानों का आदर करके उनसे उत्पन्न हुई अर्थात् उनके सम्बन्ध से प्रकट हुई बुद्धि को प्राप्त होकर निरन्तर सुखी हो ॥७॥
Subject
अब अग्निपदवाच्य राजदृष्टान्त से विद्वद्विषय को कहते हैं ॥