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Rigveda Mandal 5 / Sukta 25 / Mantra 6

87 Sukta
9 Mantra
5/25/6
Devata- अग्निः Rishi- वसुयव आत्रेयः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्द॑दाति॒ सत्प॑तिं सा॒साह॒ यो यु॒धा नृभिः॑। अ॒ग्निरत्यं॑ रघु॒ष्यदं॒ जेता॑र॒मप॑राजितम् ॥६॥

अ॒ग्निः । द॒दा॒ति॒ । सत्ऽप॑तिम् । स॒साह॑ । यः । यु॒धा । नृऽभिः॑ । अ॒ग्निः । अत्य॑म् । र॒घु॒ऽस्यद॑म् । जेता॑रम् । अप॑राऽजितम् ॥

Mantra without Swara
अग्निर्ददाति सत्पतिं सासाह यो युधा नृभिः। अग्निरत्यं रघुष्यदं जेतारमपराजितम् ॥

अग्निः। ददाति। सत्ऽपतिम्। ससाह। यः। युधा। नृऽभिः। अग्निः। अत्यम्। रघुऽस्यदम्। जेतारम्। अपराऽजितम् ॥६॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 18 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! वह (अग्निः) परमेश्वर वा विद्वान् (सत्पतिम्) श्रेष्ठों के पालन करनेवाले को (ददाति) देता है (यः) जो (अग्निः) अग्नि (युधा) युद्ध करती हुई सेना और (नृभिः) नायक अर्थात् अग्रणी मनुष्यों से (रघुष्यदम्) लघुगमनवान् (जेतारम्) जीतने और (अपराजितम्) नहीं हारनेवाले राजा को (अत्यम्) मार्ग को व्याप्त होते घोड़े को जैसे वैसे (सासाह) सहता है ॥६॥
Essence
हे विद्वानो ! जैसे ईश्वर धर्मिष्ठ जनों के लिये धर्म्मात्मा राजा को देता है और जैसे उत्तम सेना विद्वान् शूरवीर और धर्म्मात्मा सेनाध्यक्ष को प्राप्त होकर शत्रुओं को जीतती है, वैसे ही वह सब लोगों को आदर करने योग्य है ॥६॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥

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