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Rigveda Mandal 5 / Sukta 25 / Mantra 4

87 Sukta
9 Mantra
5/25/4
Devata- अग्निः Rishi- वसुयव आत्रेयः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्दे॒वेषु॑ राजत्य॒ग्निर्मर्ते॑ष्वावि॒शन्। अ॒ग्निर्नो॑ हव्य॒वाह॑नो॒ऽग्निं धी॒भिः स॑पर्यत ॥४॥

अ॒ग्निः । दे॒वेषु॑ । रा॒ज॒ति॒ । अ॒ग्निः । मर्ते॑षु । आ॒ऽवि॒शन् । अ॒ग्निः । नः॒ । ह॒व्य॒ऽवाह॑नः॑ । अ॒ग्निम् । धी॒भिः । स॒प॒र्य॒त॒ ॥

Mantra without Swara
अग्निर्देवेषु राजत्यग्निर्मर्तेष्वाविशन्। अग्निर्नो हव्यवाहनोऽग्निं धीभिः सपर्यत ॥

अग्निः। देवेषु। राजति। अग्निः। मर्तेषु। आऽविशन्। अग्निः। नः। हव्यऽवाहनः। अग्निम्। धीभिः। सपर्यत ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (अग्निः) अग्नि के सदृश वर्त्तमान तेजस्वी विद्वान् (देवेषु) विद्वानों वा पृथिवी आदिकों में और जो (अग्निः) बिजुलीरूप अग्नि (मर्त्तेषु) मरणधर्म्मवाले मनुष्य आदिकों में और जो (हव्यवाहनः) हवन करने योग्य पदार्थों को धारण करनेवाला (अग्निः) सूर्य्यादिरूप अग्नि (नः) हम लोग में (आविशन्) प्रविष्ट हुआ (राजति) प्रकाशित होता है, उस (अग्निम्) अग्नि को (धीभिः) बुद्धियों से आप लोग (सपर्य्यत) सेवो अर्थात् कार्य्य में लाओ ॥४॥
Essence
हे विद्वानो ! जो अनेक प्रकार का अग्नि आप लोगों से जाना जाये अर्थात् अनेक प्रकार के अग्नि का आप लोगों को परिज्ञान हो तो क्या-क्या सुख न पाया जाये ॥४॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥