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Rigveda Mandal 5 / Sukta 25 / Mantra 3

87 Sukta
9 Mantra
5/25/3
Devata- अग्निः Rishi- वसुयव आत्रेयः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स नो॑ धी॒ती वरि॑ष्ठया॒ श्रेष्ठ॑या च सुम॒त्या। अग्ने॑ रा॒यो दि॑दीहि नः सुवृ॒क्तिभि॑र्वरेण्य ॥३॥

सः । नः॒ । धी॒ती । वरि॑ष्थया । श्रेष्ठ॑या । च॒ । सुऽम॒त्या । अग्ने॑ । रा॒यः । दि॒दी॒हि॒ । नः॒ । सु॒वृ॒क्तिऽभिः॑ । व॒रे॒ण्य॒ ॥

Mantra without Swara
स नो धीती वरिष्ठया श्रेष्ठया च सुमत्या। अग्ने रायो दिदीहि नः सुवृक्तिभिर्वरेण्य ॥

स। नः। धीती। वरिष्ठया। श्रेष्ठया। च। सुऽमत्या। अग्ने। रायः। दिदीहि। नः। सुवृक्तिऽभिः। वरेण्य ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 17 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वरेण्य) स्वीकार करने योग्य (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! (सः) वह आप (धीती) धारणावाली (वरिष्ठया) अत्यन्त स्वीकार करने योग्य (श्रेष्ठया) अति उत्तम (सुमत्या) सुन्दर बुद्धि से (नः) हम लोगों के लिये (रायः) धनों को (दिदीहि) दीजिये (सुवृक्तिभिः) उत्तम वर्जनवाली क्रियाओं से (च) भी (नः) हम लोगों की निरन्तर वृद्धि कीजिये ॥३॥
Essence
जो उत्तम बुद्धि की इच्छा करते वा उत्तम बुद्धि को अन्य जनों के लिये देते हैं, वे ही सब लोगों से सत्कार करने योग्य हैं ॥३॥
Subject
अब अग्निसादृश्य से विद्वद्विषय को कहते हैं ॥