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Rigveda Mandal 5 / Sukta 23 / Mantra 4

87 Sukta
4 Mantra
5/23/4
Devata- अग्निः Rishi- द्युम्नो विश्वचर्षणिः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
स हि ष्मा॑ वि॒श्वच॑र्षणिर॒भिमा॑ति॒ सहो॑ द॒धे। अग्न॑ ए॒षु क्षये॒ष्वा रे॒वन्नः॑ शुक्र दीदिहि द्यु॒मत्पा॑वक दीदिहि ॥४॥

सः । हि । स्म॒ । वि॒श्वऽच॑र्षणिः । अ॒भिऽमा॑ति । सहः॑ । द॒धे । अग्ने॑ । ए॒षु । क्षये॑षु । आ । रे॒वत् । नः॒ । शु॒क्र॒ । दी॒दि॒हि॒ । द्यु॒ऽमत् । पा॒व॒क॒ । दी॒दि॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
स हि ष्मा विश्वचर्षणिरभिमाति सहो दधे। अग्न एषु क्षयेष्वा रेवन्नः शुक्र दीदिहि द्युमत्पावक दीदिहि ॥

सः। हि स्म। विश्वऽचर्षणिः। अभिऽमाति। सहः। दधे। अग्ने। एषु। क्षयेषु। आ। रेवत्। नः। शुक्र। दीदिहि। द्युऽमत्। पावक। दीदिहि ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 15 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शुक्र) सामर्थ्ययुक्त (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्तमान ! जो (विश्वचर्षणिः) सम्पूर्ण विद्याओं का प्रकाश (एषु) इन (क्षयेषु) निवास स्थानों में (अभिमाति) अभिमान जिससे हो उस (सहः) बल को (दधे) धारण करता (सः, हि) वही (स्मा) निश्चय से जीतनेवाला होता है, इससे आप (नः) हम लोगों के लिये (रेवत्) प्रशस्त धन से युक्त पदार्थ को (दीदिहि) दीजिये और हे (पावक) पवित्र, पवित्राचरण से हम लोगों के लिये (द्युमत्) प्रकाशयुक्त का (आ, दीदिहि) प्रकाश कीजिये ॥४॥
Essence
जो मनुष्य पूर्ण शरीर और आत्मा के बल को धारण करते हैं, वे सब के लिये सुख दे सकते हैं ॥४॥ इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह तेईसवाँ सूक्त और पन्द्रहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥