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Rigveda Mandal 5 / Sukta 23 / Mantra 1

87 Sukta
4 Mantra
5/23/1
Devata- अग्निः Rishi- द्युम्नो विश्वचर्षणिः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अग्ने॒ सह॑न्त॒मा भ॑र द्यु॒म्नस्य॑ प्रा॒सहा॑ र॒यिम्। विश्वा॒ यश्च॑र्ष॒णीर॒भ्या॒३॒॑सा वाजे॑षु सा॒सह॑त् ॥१॥

अग्ने॑ । सह॑न्तम् । आ । भ॒र॒ । द्यु॒म्नस्य॑ । प्र॒ऽसहा॑ । र॒यिम् । विश्वाः॑ । यः । च॒र्ष॒णीः । अ॒भि । आ॒सा । वाजे॑षु । स॒सह॑त् ॥

Mantra without Swara
अग्ने सहन्तमा भर द्युम्नस्य प्रासहा रयिम्। विश्वा यश्चर्षणीरभ्या३सा वाजेषु सासहत् ॥

अग्ने। सहन्तम्। आ। भर। द्युम्नस्य। प्रऽसहा। रयिम्। विश्वाः। यः। चर्षणीः। अभि। आसा। वाजेषु। ससहत् ॥१॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 15 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) वीरपुरुष ! (यः) जो (विश्वाः) सम्पूर्ण (प्रासहा) अत्यन्त शत्रुओं के बलों को सहनेवाली (चर्षणीः) पराक्रम से प्रकाशमान मनुष्यों की सेनाओं को (वाजेषु) संग्रामों में (सासहत्) अत्यन्त सहे और (आसा) मुख से (अभि) सब प्रकार से उपदेश देवे, उस शत्रुओं के बल को (सहन्तम्) सहते हुए (द्युम्नस्य) धन वा यश के सम्बन्ध में (रयिम्) धन को आप (आ, भर) सब प्रकार धारण करो ॥१॥
Essence
जिसकी विजय की इच्छा होवे, यह शूरवीरों की सेना उत्तम प्रकार शिक्षा की गई रक्खे और वीररस के उपदेश से उत्साह दिलाकर शत्रुओं के साथ लड़ावे ॥१॥
Subject
अब चार ऋचावाले तेईसवें सूक्त का आरम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्निपदवाच्य वीर के गुणों का उपदेश करते हैं ॥