Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 5 / Sukta 22 / Mantra 4

87 Sukta
4 Mantra
5/22/4
Devata- अग्निः Rishi- विश्वसामा आत्रेयः Chhanda- बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
अग्ने॑ चिकि॒द्ध्य१॒॑स्य न॑ इ॒दं वचः॑ सहस्य। तं त्वा॑ सुशिप्र दम्पते॒ स्तोमै॑र्वर्ध॒न्त्यत्र॑यो गी॒र्भिः शु॑म्भ॒न्त्यत्र॑यः ॥४॥

अग्ने॑ । चि॒कि॒द्धि । अ॒स्य । नः॒ । इ॒दम् । वचः॑ । स॒ह॒स्य॒ । तम् । त्वा॒ । सु॒ऽशि॒प्र॒ । द॒म्ऽप॒ते॒ । स्तोमैः॑ । व॒र्ध॒न्ति॒ । अत्र॑यः । गीः॒ऽभिः । शु॒म्भ॒न्ति॒ । अत्र॑यः ॥

Mantra without Swara
अग्ने चिकिद्ध्य१स्य न इदं वचः सहस्य। तं त्वा सुशिप्र दम्पते स्तोमैर्वर्धन्त्यत्रयो गीर्भिः शुम्भन्त्यत्रयः ॥

अग्ने। चिकिद्धि। अस्य। नः। इदम्। वचः। सहस्य। तम्। त्वा। सुऽशिप्र। दम्ऽपते। स्तोमैः। वर्धन्ति। अत्रयः। गीःऽभिः। शुम्भन्ति। अत्रयः ॥४॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 14 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (सहस्य) बल में श्रेष्ठ (सुशिप्र) सुन्दर ठुड्डी और नासिकावाले (दम्पते) स्त्री और पुरुष (अग्ने) विद्वन् ! आप जैसे (अत्रयः) तीन प्रकार के दुःखों से रहित जन (स्तोमैः) प्रशंसित व्यवहारों से (वर्धन्ति) वृद्धि को प्राप्त होते हैं और जैसे (अत्रयः) काम, क्रोध, और लोभ इन तीन दोषों से रहित जन (गीर्भिः) वाणियों से (शुम्भन्ति) पवित्र करते हैं, वैसे (नः) हम लोगों के (इदम्) इस (वचः) वचन को और (अस्य) इसके वचन को (चिकिद्धि) जानिये (तम्) उन (त्वा) आपका हम लोग सत्कार करें ॥४॥
Essence
जैसे पुरुषार्थी मनुष्य सबकी वृद्धि करते हैं और उपदेशक जन सब जनों को पवित्र करते हैं, वैसे ही सब मनुष्य आचरण करें ॥४॥ इस सूक्त में अग्नि के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥ यह बाईसवाँ सूक्त और चौदहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर उसी विषय को कहते हैं ॥