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Rigveda Mandal 5 / Sukta 22 / Mantra 3

87 Sukta
4 Mantra
5/22/3
Devata- अग्निः Rishi- विश्वसामा आत्रेयः Chhanda- स्वराडुष्निक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
चि॒कि॒त्विन्म॑नसं त्वा दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑। वरे॑ण्यस्य॒ तेऽव॑स इया॒नासो॑ अमन्महि ॥३॥

चि॒कि॒त्वित्ऽम॑नसम् । त्वा॒ । दे॒वम् । मर्ता॑सः । ऊ॒तये॑ । वरे॑ण्यस्य । ते॒ । अव॑सः । इ॒या॒नासः॑ । अ॒म॒न्म॒हि॒ ॥

Mantra without Swara
चिकित्विन्मनसं त्वा देवं मर्तास ऊतये। वरेण्यस्य तेऽवस इयानासो अमन्महि ॥

चिकित्वित्ऽमनसम्। त्वा। देवम्। मर्तासः। ऊतये। वरेण्यस्य। ते। अवसः। इयानासः। अमन्महि ॥३॥

Ashtak » 4 Adhyay » 1 Varga » 14 Mantra » 3

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Meaning
हे विद्वन् ! (वरेण्यस्य) स्वीकार करने और (अवसः) कामना करने योग्य (ते) आपके सङ्ग से (इयानासः) प्राप्त होते हुए (मर्त्तासः) मनुष्य हम लोग (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (चिकित्विन्मनसम्) विज्ञानयुक्त पुरुषों के मन के सदृश मन से युक्त (देवम्) विद्वान् (त्वा) आपको अग्नि के सदृश (अमन्महि) विशेष करके जानें ॥३॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि सदा ही विद्वानों के सङ्ग से पदार्थविद्या का खोज करें ॥३॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

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